Indian Ships: इज़राइल-ईरान युद्ध के बीच होरमुज़ जलडमरूमध्य में फंसे भारतीय जहाज़ों के लिए एक बड़ी राहत की खबर आई है। ईरान उन जहाज़ों के लिए एक सुरक्षित गलियारा तैयार कर रहा है, जो वहां से भारत की तरफ आना चाहते हैं। समुद्री डेटा कंपनी लॉयड्स लिस्ट इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अधिकारी सीधे ईरान से बातचीत कर रहे हैं और कम से कम 22 जहाज़ होरमुज़ के रास्ते भारत आने के लिए तैयार खड़े हैं। इनमें से 20 जहाज़ ऐसे हैं, जो भारत की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए बेहद ज़रूरी हैं। अब तक नौ जहाज़ इस गलियारे से निकल भी चुके हैं।
मोदी की एक फोन कॉल ने बदल दिया खेल-
इस पूरी कोशिश की नींव 12 मार्च को रखी गई, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से फोन पर बात की। उसके बाद से 24 भारतीय जहाज़ों को गुज़ारने को लेकर बातचीत शुरू हुई और अब तक दो जहाज़ों को आधिकारिक रूप से जाने की इजाज़त मिल चुकी है। लेकिन यह रास्ता मुफ्त नहीं है, रिपोर्ट के मुताबिक कम से कम एक जहाज़ को 20 लाख डॉलर यानी करीब 16 करोड़ रुपये चुकाने के बाद गुज़रने दिया गया।
कैसा है यह सुरक्षित रास्ता?
सूत्रों के मुताबिक, जिन जहाज़ों को जाने की अनुमति दी गई, उन्हें ईरान के तट के करीब से एक तय रास्ते पर चलने को कहा गया। विशेषज्ञों का मानना है, कि ईरान ने यह व्यवस्था सिर्फ भारत की मदद के लिए नहीं, बल्कि अपनी तटीय सुरक्षा को अमेरिकी और इज़राइली हमलों से बचाने के लिए भी की है। एक भारतीय एलपीजी जहाज़ को ईरान के लारक द्वीप के आसपास से असामान्य रास्ते से गुज़ारा गया, जिसका ईरानी नौसेना और बंदरगाह अधिकारी उसकी पहचान आंखों से कर सकें।
आदेश अभी भी जारी-
हालांकि राहत की खबरों के बीच एक चिंताजनक पहलू भी है। पश्चिम एशिया में हालात लगातार बिगड़ने के कारण जो जहाज़ दो हफ्ते से ज़्यादा समय से होरमुज़ में फंसे हैं उन्हें अभी भी “जहां हैं वहीं रहने” का निर्देश दिया गया है। इज़राइल ने ईरान के सबसे बड़े गैस क्षेत्र साउथ पार्स पर हमला करने के बाद से जहाज़ों की आवाजाही पूरी तरह रोक दी गई थी।
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अमेरिका की नज़र, ईरान की शर्त-
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने साफ कहा है, कि होरमुज़ जलडमरूमध्य चालू है लेकिन अमेरिका और इज़राइल से जुड़े जहाज़ों को गुज़रने नहीं दिया जाएगा। दूसरी तरफ अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा, कि अमेरिका ईरानी तेल जहाज़ों को निकलने दे रहा है ताकि बाकी दुनिया को आपूर्ति हो सके। ऐसे में भारत की कूटनीति एक बार फिर काम आती दिख रही है, न किसी का पक्ष लिया, न किसी से दुश्मनी मोल ली और अपने जहाज़ों के लिए रास्ता निकाल लिया।
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