China Economy: दुनिया में सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में चीन की पहचान दशकों पुरानी है। इलेक्ट्रिक गाड़ियां, सौर ऊर्जा के पैनल, जहाज़ निर्माण और रोबोट इन सभी क्षेत्रों में चीन आज दुनिया पर राज कर रहा है। उसका व्यापार अधिशेष यानी ट्रेड सरप्लस 1.2 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच चुका है और 2026 में उसकी वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर 4.5 से 5 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो अमेरिका की दर से लगभग दोगुनी है।
फिर भी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों के मुताबिक, वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन की हिस्सेदारी 2021 के 18.5 प्रतिशत के शिखर से घटकर 2025 के अंत तक 16.5 प्रतिशत रह गई है। Wall Street Journal की रिपोर्ट के मुताबिक, यह गिरावट उस देश के लिए हैरान करने वाली है, जो हर मोर्चे पर आगे बढ़ता दिख रहा है।
असली समस्या-
इस पहेली का जवाब दो ताकतों में छुपा है, पहली है मूल्य गिरावट यानी डिफ्लेशन और दूसरी है कमज़ोर युआन। जब किसी देश में चीज़ों की कीमतें लगातार गिरती हैं, तो वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य भी घटता है। ऊपर से अगर उस देश की मुद्रा कमज़ोर हो, तो डॉलर में मापे जाने पर पूरी अर्थव्यवस्था और भी छोटी दिखने लगती है। यही चीन के साथ हो रहा है, उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन डॉलर में उसकी कीमत लगभग वहीं की वहीं रह गई है।
विदेशी कंपनियों पर असली मार-
इसका सीधा असर उन विदेशी कंपनियों पर पड़ रहा है, जो चीन में कमाई करती हैं। युआन में होने वाली कमाई जब डॉलर या यूरो में बदली जाती है तो वो काफी कम हो जाती है। स्पेन की मशहूर कपड़ा कंपनी इंडीटैक्स जो Zara की मालिक है, कभी चीन में तेज़ी से अपने स्टोर खोल रही थी। लेकिन कमज़ोर मुद्रा और घरेलू प्रतिस्पर्धा के कारण उसने 2018 से 2026 के बीच अपने लगभग 80 प्रतिशत स्टोर बंद कर दिए।
जापान की याद दिलाता है यह हाल-
चीन की यह स्थिति उस दौर की याद दिलाती है, जब 1990 के दशक में जापान अपने आर्थिक शिखर से उतरा था। लंबे समय तक मूल्य गिरावट और कमज़ोर येन की वजह से जापान की वैश्विक हिस्सेदारी भी इसी तरह सिकुड़ गई थी। चीन के घरेलू बाज़ार में भी यही हो रहा है, कंपनियां एक-दूसरे को मात देने के लिए कीमतें घटाती जा रही हैं, जिससे मुनाफा कम हो रहा है और मूल्य गिरावट और गहरी होती जा रही है।
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निर्यात बढ़ा, पर दुनिया नाराज़ है-
घरेलू माँग कमज़ोर होने पर चीनी कंपनियाँ विदेशों में माल बेचने पर ज़्यादा ज़ोर दे रही हैं। कमज़ोर युआन इस रणनीति को और फायदेमंद बनाता है क्योंकि विदेशी मुद्रा में बिक्री से ज़्यादा आमदनी होती है। लेकिन इस सस्ते चीनी माल की बाढ़ से जर्मनी से लेकर इंडोनेशिया तक के निर्माता परेशान हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में तनाव बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी चेतावनी दी है कि चीन की वृद्धि अब बाहरी मांग पर बहुत ज़्यादा निर्भर होती जा रही है। बीजिंग को पता है कि इसका हल घरेलू खपत बढ़ाने में है और इसके शुरुआती संकेत भी दिखने लगे हैं।
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