Delhi Missing People 2026: आपने कभी सोचा है, कि जब आप सुबह उठकर चाय पीते हैं, तब तक दिल्ली में दो लोग लापता हो चुके होते हैं? जी हां, यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि राजधानी की हकीकत है। 2026 की शुरुआत में दिल्ली पुलिस के आंकड़ों ने एक ऐसी सच्चाई उजागर की है, जो हर दिल्लीवासी को सोचने पर मजबूर कर देती है, क्या हमारा शहर वाकई सुरक्षित है?
जनवरी के सिर्फ पहले पंद्रह दिनों में 800 लोग गायब हो गए। यानी हर दिन 54 लोग लापता हो रहे हैं। सबसे दिल दहला देने वाली बात यह है, कि इनमें से ज्यादातर महिलाएं और बच्चियां हैं, पूरे 509। यह सिर्फ आंकड़ें नहीं हैं, बल्कि किसी की बेटी, किसी की बहन, किसी की मां की अधूरी कहानी है।

क्यों बढ़ रहे हैं ये आंकड़े?
सवाल यह नहीं है, कि कितने लोग लापता हो रहे हैं, बल्कि यह है, कि क्यों हो रहे हैं? दिल्ली जैसे महानगर में जहां हर नुक्कड़ पर CCTV कैमरे लगे हैं, जहां पुलिस की गश्त होती है, वहां भी रोजाना 54 लोग कैसे गायब हो जाते हैं? PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, लापता हुए 800 लोगों में से अब तक सिर्फ 235 ही मिल पाए हैं। बाकी 572 परिवार अभी भी अपनों के इंतजार में आंसू बहा रहे हैं।
पुलिस डेटा बताता है, कि 191 नाबालिग और 616 वयस्क इन आंकड़ों में शामिल हैं। लेकिन जो बात रूह कंपा देती है, वह यह है, कि हर रोज 13 मासूम बच्चे दिल्ली की सड़कों से गुम हो रहे हैं। कल्पना कीजिए 13 घरों में रोज मातम, 13 मांओं के सीने में टीस, 13 बचपन जो शायद कभी वापस ना लौटें।
लड़कियों पर ज्यादा खतरा क्यों?
146 लापता नाबालिगों में सिर्फ लड़कियां हैं। यह एक गंभीर सामाजिक समस्या की ओर इशारा करता है। 12 से 18 साल की उम्र के 169 टीनएजर्स में से 138 लड़कियां थीं। इनमें से 71 फीसदी यानी 121 किशोर अभी भी नहीं मिले। क्या ये ह्यूमन ट्रैफिकिंग के शिकार हो रहे हैं? क्या घर से भागकर जा रहे हैं? या फिर कोई और खतरनाक सच्चाई है, जिससे हम मुंह मोड़े बैठे हैं?
आठ साल से कम उम्र के नौ बच्चे भी लापता हुए, जिनमें से छह अभी भी गुमशुदा हैं। ये वो उम्र है जब बच्चे अपनी सुरक्षा खुद नहीं कर सकते। फिर सवाल उठता है, क्या हम एक समाज के तौर पर फेल हो रहे हैं?

वयस्कों की कहानी भी कम दर्दनाक नहीं-
जनवरी के पहले हाफ में 616 वयस्क लापता हुए, 363 महिलाएं और 253 पुरुष। पुलिस ने 181 को तो ढूंढ लिया, लेकिन 435 अभी भी लापता हैं। ये वह लोग हैं, जिन पर परिवारों की जिम्मेदारियां थीं, जो किसी के सहारे थे, जिनके बिना घर अधूरा है।
2025 की पूरी तस्वीर देखें तो 24,508 लोग गायब हुए, जिनमें 14,870 महिलाएं थीं। 9,087 केस आज भी अनसुलझे पड़े हैं। यानी 9,087 परिवार जो आज भी इंतजार में हैं।
दस साल का डरावना ट्रेंड-
2016 से 2026 तक का डाटा एक भयानक तस्वीर पेश करता है। दस सालों में 2,32,737 लोग लापता हुए। हालांकि 1.8 लाख मिल गए, लेकिन 52,000 केस अभी भी खुले हैं। हर साल औसतन 5,000 टीनएजर्स गायब होते हैं, जिनमें 3,500 लड़कियां होती हैं। 2025 में यह संख्या चरम पर पहुंची 14,870 महिलाएं लापता हुईं।
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सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं है। सवाल यह है, कि क्या हम अपनी बेटियों, बहनों, बच्चों को सुरक्षित दिल्ली दे पा रहे हैं? क्या पुलिस के पास पर्याप्त रिसोर्स हैं? क्या हमारी लॉ एनफोर्समेंट सिस्टम में गंभीर खामियां हैं? और सबसे बड़ा सवाल, क्या हम एक समाज के तौर पर इस मुद्दे को सिरियसली ले रहे हैं, या फिर यह भी बाकी खबरों की तरह कुछ दिनों में भुला दी जाएगी?
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