Psychological Facts: आप सड़क पर चल रहे हैं, बस स्टॉप पर खड़े हैं या फिर किसी दोस्त से बात कर रहे हैं, और पता भी नहीं चलता, कि कब आपके हाथ जेब में चले गए। बिल्कुल नेचुरल लगता है ना? लेकिन रुकिए! साइकोलॉजिस्ट कहते हैं, कि यह मामूली सी दिखने वाली आदत दरअसल आपके मन की बातें बयां कर रही होती है। जी हां, जेब में हाथ डालकर चलना सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि आपकी भावनाओं का आईना है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि ज्यादातर लोग इस आदत के असली मतलब को नहीं जानते या फिर जानना नहीं चाहते। तो चलिए आज जानते हैं कि मनोवैज्ञानिक इस आदत के बारे में क्या कहते हैं और आपकी यह छोटी सी हरकत दूसरों को आपके बारे में क्या बताती है।
बॉडी लैंग्वेज बोलती है, भले ही आप चुप रहें-
द् इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, मशहूर साइकोलॉजिस्ट डॉ अल्बर्ट मेहराबियन ने अपनी रिसर्च में पाया, कि हमारी बॉडी लैंग्वेज अक्सर शब्दों से ज्यादा कह जाती है। उन्होंने बताया, “लोग अनजाने में अपनी फीलिंग्स को मैनेज करते रहते हैं।” यानी आपके हाथ कहां हैं, आप कैसे खड़े हैं, ये सब कुछ ना कुछ जरूर बोल रहा है, भले ही आपकी जुबान बंद हो।
जेब में हाथ डालना भी ऐसा ही एक इशारा है, जो बिना बोले बहुत कुछ कह जाता है। और सच मानिए, ये जो कहता है वो काफी दिलचस्प है।
खुद को सुरक्षित महसूस कराने का तरीका-
द जर्नल ऑफ नॉनवर्बल बिहेवियर में छपी एक स्टडी के मुताबिक, जब हम अपने हाथों को छुपाते हैं तो यह भावनात्मक संयम का संकेत होता है। हाथ हमारे शरीर का सबसे एक्सप्रेसिव हिस्सा हैं। जब हम उन्हें जेब में डाल लेते हैं, तो यह दिखाता है कि हम अपनी फीलिंग्स को कंट्रोल में रखना चाहते हैं।
डॉ एमी कड्डी, जो कॉन्फिडेंस और बॉडी पोस्चर पर रिसर्च करती हैं, कहती हैं, कि जब लोग असुरक्षित या सतर्क महसूस करते हैं तो वे अपने शरीर को समेट लेते हैं। उनके शब्दों में, “जब लोग मानसिक रूप से असुरक्षित महसूस करते हैं, तो उनका शरीर छोटा हो जाता है।”
सोचिए, जब आप किसी नई जगह पर होते हैं या फिर किसी अनजान के सामने खड़े होते हैं, तो अक्सर आपके हाथ खुद-ब-खुद जेब में चले जाते हैं। यह आपका शरीर खुद को छुपाने की कोशिश कर रहा होता है, बिल्कुल कछुए की तरह जो खतरा महसूस होने पर अपने खोल में घुस जाता है।
ये जरूरी नहीं कि आप डरपोक हैं-
अब यहां एक ट्विस्ट है। साइकोलॉजिस्ट कहते हैं कि जेब में हाथ डालने का मतलब हमेशा कमजोरी या डर नहीं होता। कई बार यह बस आपकी प्राइवेसी की जरूरत को दर्शाता है। यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो की स्टडी बताती है, कि जो लोग गहरे सोचने वाले या इमोशनली रिजर्व्ड होते हैं, वे अपनी मानसिक स्पेस बचाने के लिए ऐसा करते हैं।
यानी जरूरी नहीं कि आपमें कॉन्फिडेंस की कमी हो, हो सकता है आप बस अपने विचारों में खोए हों। मनोवैज्ञानिक डॉ सुसान क्रॉस व्हिटबोर्न समझाती हैं, “यह इमोशनल रेगुलेशन का तरीका है। कुछ लोग अपनी बाहरी एक्सप्रेशन को सीमित करके अपनी फीलिंग्स को संभालते हैं।” सीधे शब्दों में कहें, तो जेब में हाथ डालना कई बार सेल्फ-कंट्रोल का संकेत है, ना कि कमजोरी का।
लोगों के बीच में तो और भी खास मतलब है-
अब बात करते हैं सबसे इंटरस्टिंग पार्ट की। जब आप किसी ग्रुप में या बातचीत के दौरान जेब में हाथ डाले रखते हैं, तो साइकोलॉजिस्ट इसे और गंभीरता से लेते हैं। पर्सनालिटी एंड इंडिविजुअल डिफरेंसेज जर्नल में छपी एक स्टडी कहती है, कि जो लोग बात करते वक्त अपने हाथ छुपाए रखते हैं, वे अक्सर अपनी राय देने या नए लोगों से जुड़ने में थोड़े हिचकिचाते हैं, खासकर नई जगहों पर।
लेकिन ध्यान दीजिए, इसका मतलब यह नहीं, कि उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है। बल्कि वे चुपचाप माहौल को समझ रहे होते हैं, लोगों को परख रहे होते हैं और यह देख रहे होते हैं, कि बोलना सेफ है या नहीं। रिसर्चर्स कहते हैं कि ऐसे लोग “सोशल डॉमिनेंस से ज्यादा इमोशनल सेफ्टी को तरजीह देते हैं।” यानी वे भीड़ में सबसे आगे रहने के बजाय खुद को सुरक्षित महसूस कराना पसंद करते हैं।
वो सच जो कोई नहीं मानता-
अब आते हैं उस बात पर जो बहुत कम लोग मानते हैं। साइकोलॉजिकल साइंस में छपी एक रिसर्च के मुताबिक, लोग तब जेब में हाथ डालते हैं जब वे किसी बात को लेकर मेंटली बिज़ी होते हैं या कुछ सोच रहे होते हैं। जेब में हाथ डालना दरअसल अंदर की ओर मुड़ने का इशारा है। हो सकता है आप कुछ पर्सनल सोच रहे हों, कोई फैसला ले रहे हों, या फिर थोड़ी देर के लिए खुद को दुनिया से अलग कर रहे हों।
यह दूसरों से भागने के बारे में कम है और खुद से मिलने के बारे में ज्यादा। सीधी बात है, जब आपका दिमाग किसी और दुनिया में होता है, तो आपके हाथ जेब में चले जाते हैं। यह आपके शरीर का तरीका है यह कहने का कि “अभी मुझे थोड़ी स्पेस चाहिए।”
तो क्या करें अब?
साइकोलॉजिस्ट कहते हैं कि कोई एक जेस्चर आपकी पूरी पर्सनालिटी नहीं बताता। लेकिन हां, बार-बार दोहराई जाने वाली आदतें जरूर इस बात को प्रभावित करती हैं कि लोग आपको कैसे देखते हैं।
सोशल साइकोलॉजिकल एंड पर्सनालिटी साइंस की एक रिसर्च बताती है कि खुले हाथों के जेस्चर्स को हर जगह, हर कल्चर में अप्रोचेबिलिटी और भरोसे से जोड़ा जाता है। इसीलिए नेता, पब्लिक स्पीकर्स और टीचर्स को हमेशा यही सिखाया जाता है कि अपने हाथ दिखाएं, छुपाएं नहीं।
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लेकिन यहां समझने वाली बात यह है कि आपको अपनी आदत बदलने की जरूरत नहीं है। बस यह समझिए कि यह आदत क्या कह रही है। जब आप इसे समझ जाते हैं, तो आप खुद तय कर सकते हैं कि कब अपने अंदर रहना है और कब बाहर खुलना है। जैसा कि डॉ व्हिटबोर्न कहती हैं, “बॉडी लैंग्वेज किसी को जज करने के लिए नहीं है। यह खुद को समझने के लिए है।”
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तो अगली बार जब आपके हाथ जेब में जाएं, तो जरा रुकिए और सोचिए, आप उस वक्त क्या महसूस कर रहे हैं। शायद आपका शरीर आपसे कुछ कहने की कोशिश कर रहा है।



