Hanuman Name Ban: पूरे भारत में हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है, उनके नाम से मंदिर गूंजते हैं, लाल झंडे लहराते हैं और करोड़ों भक्त उनकी जय-जयकार करते हैं। लेकिन उत्तराखंड के चमोली ज़िले में करीब 14,000 फीट की ऊंचाई पर बसे द्रोणागिरि गांव में हनुमान, बजरंग, संकटमोचन या मारुति इनमें से कोई भी नाम आपको सुनाई नहीं देगा। न यहां कोई मंदिर है, न लाल झंडा, न कोई मूर्ति और इस परंपरा के पीछे है, एक 2,000 साल पुरानी नाराज़गी जो आज भी उतनी ही ताज़ी है।
त्रेता युग की वो रात जिसने सब बदल दिया-
बात उस वक्त की है, जब लंका में राम और रावण के बीच युद्ध चल रहा था। लक्ष्मण जी एक बाण से मूर्छित हो गए और वैद्यों ने कहा कि सिर्फ संजीवनी बूटी ही उनकी जान बचा सकती है, वो भी सूर्योदय से पहले। हनुमान जी तुरंत हिमालय की तरफ उड़ चले और उस इलाके में पहुँचे जिसे आज द्रोणागिरि कहते हैं। लेकिन हज़ारों जड़ी-बूटियों के बीच वे संजीवनी पहचान नहीं पाए। एक बुज़ुर्ग महिला ने उन्हें पहाड़ की दिशा दिखाई। समय कम था और बूटी पहचान नहीं आ रही थी, तब हनुमान जी ने एक बड़ा फैसला लिया और पूरा पहाड़ ही उठाकर लंका ले गए।
जब एक देवता की तपस्या टूटी-
यहीं से द्रोणागिरि की नाराज़गी शुरू होती है। गांव वालों की मान्यता है कि उस पहाड़ पर लटू देवता गहरी तपस्या में लीन थे। हनुमान जी ने बिना अनुमति लिए पहाड़ उठाया जिससे देवता की तपस्या भंग हुई और उनका दाहिना हाथ भी उखड़ गया, यह एक पवित्र स्थान के साथ बिना अनुमति के किए गए व्यवहार का प्रतीक माना जाता है। आज भी द्रोणागिरि पहाड़ की चोटी सपाट है और गांव वाले कहते हैं, यही वह निशान है, जो हनुमान जी के उस काम की याद दिलाता है।
परंपरा जो आज भी ज़िंदा है-
गाँव का मुख्य देवता लटू देवता हैं और उनकी पूजा यहां बड़े श्रद्धाभाव से होती है। हनुमान से जुड़ा हर नाम और हर प्रतीक यहाँ वर्जित है। और उस बुज़ुर्ग महिला का क्या हुआ जिसने हनुमान को रास्ता दिखाया था? कहते हैं उसे समाज से बाहर कर दिया गया और आज भी गांव की महिलाएं मुख्य मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं, यह उसी गलती की सज़ा मानी जाती है।
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एक सोचने वाली बात-
द्रोणागिरि के लोग हनुमान जी से नफरत नहीं करते। वे जानते हैं, कि उनका इरादा नेक था, लक्ष्मण की जान बचानी थी। लेकिन उनका मानना है, कि किसी की जान बचाने की इच्छा भी किसी और को नुकसान पहुंचाने का अधिकार नहीं देती। यहां तक कि एक देवता को भी अनुमति लेनी चाहिए थी। यह सोच कितनी गहरी है, जब पौराणिक कथाएं सिर्फ कहानियां न रहकर जीवन का हिस्सा बन जाती हैं।
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