Recording Police Action
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    Recording Police Action: आज के स्मार्टफोन युग में हर नागरिक के हाथ में एक कैमरा है। सड़क पर ट्रैफिक चेकिंग हो या कोई विवाद, पुलिस और जनता के बीच होने वाली बातचीत अब तुरंत रिकॉर्ड होकर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है। लेकिन सवाल यह उठता है, कि क्या कोई आम नागरिक कानूनी रूप से पुलिस की ड्यूटी के दौरान उन्हें रिकॉर्ड कर सकता है? यह सवाल आज के दौर में बेहद अहम हो गया है।

    पब्लिक स्क्रूटनी और वायरल वीडियो का दौर-

    हाल के वर्षों में पुलिस के आचरण की सार्वजनिक जांच तेज हुई है। कई वायरल वीडियो ने पुलिस की ज्यादती, अनुचित बल प्रयोग और अधिकारों के दुरुपयोग को उजागर किया है। पीड़ितों या आसपास के लोगों द्वारा बनाए गए, ऐसे वीडियो बाद में अदालती कार्यवाही में महत्वपूर्ण सबूत के रूप में काम आए हैं। लेकिन अक्सर देखा गया है, कि पुलिस अधिकारी नागरिकों को रिकॉर्डिंग से रोकने की कोशिश करते हैं, कभी जबरदस्ती तो कभी कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर। इससे लोगों के मन में भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

    भारतीय कानून क्या कहता है?

    समाचार वेबसाइट दैनिक जागरण के मुताबिक, कुमार एंड मलिक लॉ ऑफिसेस के एडवोकेट और सीनियर पार्टनर निशांत कुमार ने कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया, कि भारत में कोई ऐसा कानून नहीं है, जो साफ तौर पर कहता हो, कि नागरिक पुलिस की कार्रवाई रिकॉर्ड कर सकते हैं। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह है, कि कोई कानून इसे प्रतिबंधित भी नहीं करता।

    भारतीय कानून के तहत जब पुलिस अधिकारी सार्वजनिक स्थानों पर आधिकारिक कर्तव्य निभा रहे होते हैं, तो वह लोक सेवक के रूप में वैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे होते हैं। ऐसा आचरण सार्वजनिक जांच के दायरे में आता है। सार्वजनिक स्थान पर गोपनीयता की कोई उचित अपेक्षा नहीं होती, इसलिए वहां होने वाली घटनाओं को रिकॉर्ड करना कानूनी रूप से अनुमत है। इसके अलावा, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसमें सूचना एकत्र करने का अधिकार शामिल है।

    क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में रिकॉर्डिंग का अधिकार शामिल है?

    एडवोकेट निशांत कुमार के अनुसार, अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संवैधानिक गारंटी में सूचना एकत्र करने, प्राप्त करने और प्रसारित करने का अधिकार शामिल है। रिकॉर्डिंग सूचना एकत्र करने का एक मूलभूत साधन है और इसलिए यह स्वतंत्र अभिव्यक्ति के दायरे में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है, कि पारदर्शिता, जवाबदेही और सूचित सार्वजनिक विमर्श लोकतंत्र के आवश्यक स्तंभ हैं। जब सरकारी अधिकारी सार्वजनिक स्थानों पर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, तो उनके आचरण को दस्तावेजित करना लोकतांत्रिक निगरानी को मजबूत करता है।

    कानून क्या परमिट करता है और क्या नहीं-

    हालांकि रिकॉर्ड करने का अधिकार संवैधानिक रूप से संरक्षित है, यह पूर्ण नहीं है। इस अधिकार का प्रयोग कानूनी और जिम्मेदारी से किया जाना चाहिए। रिकॉर्डिंग से सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा नहीं आनी चाहिए, यह किसी मौजूदा कानून का उल्लंघन नहीं करनी चाहिए और आधिकारिक कर्तव्यों में हस्तक्षेप नहीं करनी चाहिए। भारतीय दंड संहिता में लोक सेवक को उनके वैध कर्तव्य निर्वहन में बाधा डालना अपराध है।

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    इसलिए रिकॉर्डिंग तभी तक अनुमत है, जब तक यह हस्तक्षेप या बाधा नहीं बनती। फोन की जब्ती केवल कानून के अनुसार ही वैध है, जैसे कि सीआरपीसी की धारा 102 के तहत, जब डिवाइस वास्तव में किसी अपराध से जुड़ा होने का संदेह हो। किसी भी मनमानी जब्ती, फुटेज को जबरन डिलीट करना या फोन तक जबरदस्ती पहुंच बनाना गैरकानूनी है। पुलिस की कार्रवाई को रिकॉर्ड करना जवाबदेही सुनिश्चित करने, शक्ति के दुरुपयोग को रोकने और नागरिकों को गैरकानूनी कार्रवाई से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस लेख में दी गई जानकारी अंग्रेजी समाचार वेबसाइट दैनिक जागरण और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से ली गई है।

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    By sumit

    मेरा नाम सुमित है और मैं एक प्रोफेशनल राइटर और जर्नलिस्ट हूँ, जिसे लिखने का पाँच साल से ज़्यादा का अनुभव है। मैं टेक्नोलॉजी और लाइफस्टाइल टॉपिक के साथ-साथ रिसर्च पर आधारित ताज़ा खबरें भी कवर करता हूँ। मेरा मकसद पढ़ने वालों को सही और सटीक जानकारी देना है।