India Russia Oil Trade: भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक वार्ता में रूसी कच्चे तेल का मुद्दा एक कांटे की तरह बन गया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने आज से 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया है, लेकिन भारतीय रिफाइनरी अधिकारियों ने साफ संकेत दिया है, कि रूसी कच्चे तेल की खरीदारी रुकने की संभावना नहीं है। सरकार ने अमेरिकी दबाव के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है और स्पष्ट कर दिया है, कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है।
इस कठिन घड़ी में भारतीय रिफाइनरियों का एक स्वर में कहना है, कि वे अमेरिकी शुल्क के बावजूद भी रूसी तेल का आयात जारी रखेंगे। यह फैसला न केवल आर्थिक कारणों से लिया गया है, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और रणनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए भी जरूरी है।
रिफाइनरी अधिकारियों का स्पष्ट संदेश-
रिफाइनरी के वरिष्ठ अधिकारियों ने ईटी को बताया, कि अभी तक रूसी तेल की खरीदारी रोकने के लिए कोई आधिकारिक निर्देश नहीं आया है। हालांकि सितंबर में माल लादने के लिए आदेश में कुछ कमी देखी गई थी, लेकिन यह शुल्क की अनिश्चितता के कारण था। अधिकारियों के अनुसार, रूसी कच्चे तेल पर छूट भी कम हो गई है। अब यह प्रति बैरल 1.5 से 1.7 डॉलर है, जबकि पिछले साल यह 2.5 से 3 डॉलर तक थी।
सरकार का संदेश-
उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ईटी से कहा, “सरकार का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है ‘देश पहले, व्यापार बाद में’।” यह बयान भारत की नीति की रीढ़ दिखाता है। सरकार का मानना है, कि व्यापारिक वार्ता में अस्थायी आर्थिक कठिनाइयों से समझौता हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय हित पर कोई समझौता नहीं।
अधिकारियों और कार्यपालकों का कहना है, कि भारत अमेरिका के साथ दृढ़ता से बातचीत जारी रखे हुए है। उनका मानना है, कि यदि तेल आयात के मामले में झुकाव दिखाया जाए, तो अमेरिका की तरफ से और भी मांगें आ सकती हैं। यह एक रणनीतिक सोच है, जो लंबे समय में भारत के हितों की रक्षा करेगी।
प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक एक जैसा रुख-
सरकार के सभी स्तरों पर इस मुद्दे को लेकर एकमत दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री एस जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल सभी ने यह संकेत दिया है, कि वे अमेरिकी मांगों के आगे झुकने की बजाय भारतीय निर्यातकों को चुनौतियों में सहयोग देना पसंद करेंगे। यह एकजुट दृष्टिकोण भारत की कूटनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है।
दबाव स्वीकार नहीं-
भारतीय तेल उद्योग के प्रतिनिधियों का कहना है, कि रूसी तेल से बदलाव करना तकनीकी रूप से संभव है। वैश्विक बाजार में पर्याप्त आपूर्ति उपलब्ध है और कीमतें भी अनुकूल हैं। लेकिन मुद्दा यह नहीं है, कि यह संभव है या नहीं, बल्कि यह है, कि अमेरिकी दबाव के आगे झुकना उचित नहीं है।
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वैश्विक बाजार पर न्यूनतम प्रभाव-
उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने समझाया, “आपूर्ति श्रृंखला को केवल पुनः व्यवस्थित करना होगा। रूसी तेल पर प्रतिबंध नहीं है और यह वैश्विक बाजार में उपलब्ध रहेगा। मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।” उन्होंने बताया, कि यदि भारतीय रिफाइनरियों की जगह कोई और खरीदार रूसी तेल खरीदता है, तो वे अपनी मूल आपूर्ति को बदल देंगे।
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