Delhi Heat Wave
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    Delhi Heat Wave: भारत में जलवायु परिवर्तन अब धीरे-धीरे एक ऐसी समस्या बन चुका है, जो दिखती कम है लेकिन असर बहुत गहरा डाल रही है। Natural Resources Defense Council (एनआरडीसी) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, देश के करीब 57% जिले अब उच्च से अति-उच्च हीट रिस्क जोन में आ चुके हैं। इसका सीधा असर लगभग 76% आबादी पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है, कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो इस सदी के अंत तक लू की घटनाएं 3 से 4 गुना तक बढ़ सकती हैं। यानी आने वाले सालों में गर्मी सिर्फ असहज नहीं, बल्कि खतरनाक साबित हो सकती है।

    आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता-

    रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ 2024 में ही देशभर में 44,000 से ज्यादा हीटस्ट्रोक के मामले सामने आए। वहीं 1992 से 2015 के बीच लू के कारण 24,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। Global Heat and Cooling Forum के दौरान जारी इस रिपोर्ट ने साफ कर दिया है, कि यह समस्या अब केवल मौसम तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है।

    दिल्ली-एनसीआर में हालात गंभीर-

    राजधानी Delhi और आसपास के इलाकों की स्थिति भी काफी चिंताजनक है। रिपोर्ट के मुताबिक, यहां के 50% से ज्यादा जिले ‘अति उच्च जोखिम’ की श्रेणी में आ गए हैं। दिल्ली के मध्य, उत्तर, उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पूर्वी हिस्सों में गर्मी का असर ज्यादा देखा जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है, कंक्रीट का बढ़ता ढांचा और हरियाली की कमी। दिन की गर्मी रात में भी बनी रहती है, जिससे लोगों को राहत नहीं मिल पाती।

    बदल रही है सरकार की रणनीति-

    अच्छी बात यह है, कि अब सरकार भी इस खतरे को गंभीरता से ले रही है। पहले जहां हीट एक्शन प्लान केवल सलाह तक सीमित थे, अब उन्हें जमीनी स्तर पर लागू किया जा रहा है। वाराणसी, जोधपुर और ठाणे जैसे शहरों में वार्ड स्तर पर हीट मैपिंग की जा रही है। जोधपुर में ‘नेट-जीरो कूलिंग स्टेशन’ जैसे इनोवेशन किए गए हैं, जो बाहरी तापमान से 8-12 डिग्री तक ठंडक देते हैं। इसके अलावा 11 राज्यों ने हीटवेव को ‘राज्य-विशिष्ट आपदा’ घोषित कर दिया है, जिससे राहत कार्यों के लिए सीधे फंड का इस्तेमाल संभव हो गया है।

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    अब चाहिए लंबी सोच वाला समाधान-

    रिपोर्ट साफ कहती है, कि सिर्फ पानी पिलाने या शेल्टर बनाने से काम नहीं चलेगा। अब शहरों को ‘ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’ यानी जलाशयों और हरियाली के साथ विकसित करना होगा। साथ ही ‘पैसिव कूलिंग’ यानी बिना बिजली के ठंडक देने वाले उपायों को भी अपनाना जरूरी है। अगर अभी से ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह ‘खामोश आपदा’ और भी खतरनाक रूप ले सकती है।

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    By sumit

    मेरा नाम सुमित है और मैं एक प्रोफेशनल राइटर और जर्नलिस्ट हूँ, जिसे लिखने का पाँच साल से ज़्यादा का अनुभव है। मैं टेक्नोलॉजी और लाइफस्टाइल टॉपिक के साथ-साथ रिसर्च पर आधारित ताज़ा खबरें भी कवर करता हूँ। मेरा मकसद पढ़ने वालों को सही और सटीक जानकारी देना है।