Allahabad High Court
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    Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम और चर्चित मामले में ऐसा फैसला सुनाया, जिसने सोशल मीडिया से लेकर कानूनी गलियारों तक हर किसी का ध्यान खींच लिया। कोर्ट ने साफ कहा, कि अगर कोई शादीशुदा मर्द किसी अडल्ट महिला के साथ उसकी मर्जी से live-in रिलेशनशिप में रहता है, तो यह कोई क्रिमिनल ऑफेंस नहीं है। Justice JJ Munir और Justice Tarun Saxena की बेंच ने यह टिप्पणी अनामिका और अन्य vs उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य केस की सुनवाई के दौरान की।

    क्या था पूरा मामला?

    UP के शहांजहांपुर की रहने वाली अनामिका और उनके साथी ने हाई कोर्ट में एक प्ली दायर की थी, जिसमें उन्होंने महिला के परिवार से प्रोटेक्शन मांगी थी। Bar and Bench की रिपोर्ट के मुताबिक, महिला के घरवाले इस कपल को लगातार धमकियां दे रहे थे, यहां तक कि ऑनर किलिंग की चेतावनी भी दी गई थी। Anamika ने पहले ही Shahjahanpur के पुलिस स्टेशन में एप्लीकेशन देकर बताया था, कि वो अपनी मर्जी से उस मर्द के साथ रह रही हैं और उन्हें किसी का डर नहीं है, बस अपने परिवार से जान का खतरा है।

    कानून और नैतिकता को अलग रखो-

    महिला के परिवार की तरफ से वकील ने दलील दी, कि चूँकि वो मर्द पहले से शादीशुदा है, इसलिए उसका किसी दूसरी औरत के साथ रहना एक अपराध है। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा, कि “Morality और law को अलग रखना होगा। अगर कानून के तहत कोई ऑफेंस नहीं बनती, तो सोशल ओपिनियन और नैतिकता कोर्ट के फैसले को गाइड नहीं कर सकती।” कोर्ट ने यह भी कहा, कि Anamika एक अडल्ट हैं और उन्हें अपनी जिंदगी के फैसले लेने का पूरा हक है।

    Police की चुप्पी पर भी कोर्ट ने लगाई फटकार-

    सबसे हैरान करने वाली बात यह रही, कि अनामिका ने एसपी को एप्लिकेशन दी थी, फिर भी पुलिस ने उनके परिवार के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया। हाई कोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, कि दो अडल्ट्स को साथ रहने पर प्रोटेक्शन देना पुलिस की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Shakti Vahini v. Union of India (2018) फैसले का हवाला भी दिया।

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    कोर्ट ने क्या-क्या किया?

    कोर्ट ने स्टेट को नोटिस जारी करके 8 अप्रैल तक जवाब मांगा। कपल को तुरंत प्रोटेक्शन दी गई, महिला के परिवार द्वारा मर्द पर लगाया गया, किडनेपिंग का केस खारिज कर दिया गया और परिवार के सदस्यों को उनके घर में घुसने या किसी भी तरह से उनसे कॉन्टैक्ट करने से रोक दिया गया। यह फैसला एक बार फिर यह साबित करता है, कि भारतीय अदालतें पर्सनल लिबर्टि को सामाजिक दबाव से ऊपर रखती हैं।

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    By sumit

    मेरा नाम सुमित है और मैं एक प्रोफेशनल राइटर और जर्नलिस्ट हूँ, जिसे लिखने का पाँच साल से ज़्यादा का अनुभव है। मैं टेक्नोलॉजी और लाइफस्टाइल टॉपिक के साथ-साथ रिसर्च पर आधारित ताज़ा खबरें भी कवर करता हूँ। मेरा मकसद पढ़ने वालों को सही और सटीक जानकारी देना है।