Ayatollah Ali Khamenei: तेहरान की सड़कों पर शनिवार को कुछ ऐसा नजारा था, जो शायद ही किसी ने पहले देखा हो। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार शुरू हो चुका है और यह कोई एक दिन की बात नहीं बल्कि पूरे तीन दिन तक चलने वाला शोक समारोह है। इस दौरान प्रशासन ने पूरे शहर को जैसे ठप्प ही कर दिया – सड़कें बंद, एयरस्पेस बंद, और रोजमर्रा की जिंदगी थम सी गई। इमाम खोमैनी मोसल्ला ग्रैंड मस्जिद में हजारों-लाखों लोग अपने चहेते नेता को आखिरी सलाम देने पहुंचे, जहां तीन दिनों तक उनका पार्थिव शरीर रखा जाएगा।
लाल-सफेद झंडों का गहरा मतलब-
अगर आपने तस्वीरों में देखा हो, तो हर तरफ लोगों के हाथों में लाल-सफेद झंडे लहराते दिख रहे हैं। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, ये झंडे यूं ही नहीं हैं – शिया मुस्लिम परंपरा में ये “शहादत” और “बदले” का प्रतीक माने जाते हैं। इन झंडों पर फारसी में “या हुसैन” लिखा है, जो 7वीं सदी में इमाम हुसैन की शहादत की याद दिलाता है। इमाम हुसैन पैगंबर मोहम्मद के नवासे थे और शिया समुदाय में बेहद सम्मानित माने जाते हैं। कर्बला की जंग में उनकी शहादत हुई थी, जिसने आगे चलकर शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच एक बड़ी लकीर खींच दी थी।
The final noon adhan in Tehran
The call to the noon prayer echoes across Tehran as the funeral procession of the pure bodies of the martyred Leader of the Islamic Revolution and his martyred family members passes through the city.
July 6, 2026#WeMustRise#MartyrKhamenei pic.twitter.com/omEextxYsz— Khamenei Media (@Khamenei_m) July 6, 2026
धार्मिक प्रतीक अब बना राजनीतिक संदेश-
दिलचस्प बात यह है कि यह झंडा सिर्फ धार्मिक भावना नहीं दिखाता, बल्कि ईरानी सरकार ने इसे आज के राजनीतिक हालात से भी जोड़ दिया है। “या हुसैन” लिखकर मानो यह संदेश दिया जा रहा है कि आज का संघर्ष भी कर्बला जैसा ही है – अन्याय के खिलाफ खड़े होने की लड़ाई। यानी पुरानी धार्मिक कहानी को आज के हालात से जोड़कर एक नया नैरेटिव गढ़ा जा रहा है।
पहले भी दिख चुका है यह झंडा-
खामेनेई के ताबूत पर यही झंडा लिपटा हुआ नजर आया, और मोसल्ला मस्जिद में लगातार आ रहे मातमी लोग भी इसे थामे दिखे। गौर करने वाली बात यह है कि यह झंडा कोई नई चीज नहीं है – इससे पहले 2020 में IRGC कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत के वक्त भी यही झंडा दिखा था।
सिर्फ लाल-सफेद झंडा ही नहीं, बल्कि ईरान का राष्ट्रीय झंडा और लेबनान के हिज्बुल्लाह ग्रुप का हरा-पीला झंडा भी भीड़ में आम दिखा। यानी यह सिर्फ एक शख्स का अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि एक पूरे विचारधारा का प्रदर्शन बन गया।
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मुहर्रम के महीने से हुआ मेल-
खास बात यह भी है, कि खामेनेई की मौत इस्लामिक महीने मुहर्रम में हुई है, जब शिया समुदाय इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद करता है। अब उनका पार्थिव शरीर इराक के कर्बला स्थित इमाम हुसैन की दरगाह तक ले जाया जाएगा, जहां हफ्ते भर चलने वाला स्मरण समारोह होगा।
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