Pappu Yadav: देश की राजनीति में एक बार फिर बयानबाज़ी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। बिहार के पूर्णिया से निर्दलीय सांसद Pappu Yadav के एक बयान ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। महिलाओं की भागीदारी पर बात करते हुए, उन्होंने ऐसा दावा कर दिया, जिसने हर तरफ तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दे दिया।
क्या कहा पप्पू यादव ने?
महिला आरक्षण बिल पर चर्चा के दौरान Pappu Yadav ने कहा, कि “90% महिलाएं बिना किसी पुरुष नेता के कमरे में गए राजनीति में नहीं आ सकतीं।” उन्होंने आगे यह भी आरोप लगाया, कि ज्यादातर पुरुष राजनेता “गिद्ध” जैसे होते हैं और महिलाओं का शोषण अब एक कल्चर बन चुका है।
उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बहस छिड़ गई। कई लोग इसे महिलाओं का अपमान बता रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीति के काले सच की ओर इशारा मान रहे हैं।
#WATCH | Purnea, Bihar: Independent MP Pappu Yadav says, "…In India, women are called goddesses, but they will never be respected here. System and society are responsible for this…90% of women cannot do politics without entering the room of politicians…"
— ANI (@ANI) April 21, 2026
(20.04.2026) pic.twitter.com/WyHY4ZitUJ
बीजेपी का पलटवार-
इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता Shehzad Poonawalla ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इसे घृणित और महिला विरोधी बताते हुए कहा, कि यह विपक्ष की सोच को दर्शाता है। उनके मुताबिक, इस तरह के बयान महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाते हैं और राजनीति में उनकी भागीदारी को कमज़ोर करते हैं।
अन्य नेताओं की भी तीखी प्रतिक्रिया-
बीजेपी नेता Charu Pragya ने भी इस बयान की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि महिलाओं के प्रति सोच को दिखाता है। उनके अनुसार, ऐसे व्यक्ति को संसद में रहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए और उन पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
महिला आयोग ने लिया संज्ञान-
विवाद बढ़ने के बाद बिहार राज्य महिला आयोग ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है। आयोग ने Pappu Yadav को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इससे साफ है, कि यह मामला अब सिर्फ राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कानूनी दायरे में भी पहुंच चुका है।
क्या राजनीति में महिलाओं के लिए माहौल सुरक्षित है?
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर उस बहस को सामने ला दिया है, कि क्या भारतीय राजनीति महिलाओं के लिए सुरक्षित और समान अवसर देने वाला क्षेत्र है? एक तरफ महिला आरक्षण की मांग और चर्चा है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे बयान इस मुद्दे को और जटिल बना देते हैं।
कई एक्सपर्ट्स मानते हैं, कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सिर्फ कानून ही नहीं, बल्कि सोच में बदलाव भी जरूरी है। ऐसे बयान न केवल महिलाओं के आत्मविश्वास को प्रभावित करते हैं, बल्कि समाज में गलत संदेश भी देते हैं।
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अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा, कि यह विवाद सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सोच पर सवाल उठाता है, जो आज भी समाज के कुछ हिस्सों में मौजूद है। अब देखना होगा, कि इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है और क्या इससे राजनीति में महिलाओं के लिए माहौल बेहतर बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाएगा।
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