Ramya Social Media Post: कर्नाटक की मशहूर एक्ट्रेस और कांग्रेस नेता दिव्या स्पंदना, जिन्हें रम्या के नाम से जाना जाता है, इन दिनों सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल हो रही हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट द्वारा आवारा कुत्तों पर की गई टिप्पणी के जवाब में उनके एक पोस्ट ने इंटरनेट पर तूफान खड़ा कर दिया है। जो बहस पब्लिक सेफ्टी और स्ट्रे डॉग मैनेजमेंट से शुरू हुई थी, वो अब एक बड़े पॉलिटिकल और सोशल डिबेट का मुद्दा बन गई है।
क्या था वो पोस्ट जिसने मचाया बवाल?
रम्या ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक पोस्ट शेयर किया, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का जिक्र किया, कि यह अंदाजा लगाना मुश्किल है, कि कुत्ता कब काट सकता है। इस बात पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए रम्या ने एक तुलना पेश की जो काफी विवादास्पद साबित हुई। उन्होंने लिखा, कि इसी तर्क से तो हम किसी पुरुष के मन को भी नहीं पढ़ सकते, कि वो कब रेप या मर्डर कर सकता है, तो क्या इसका मतलब है, कि सभी पुरुषों को जेल में डाल दिया जाए।

यह बयान सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। लोगों ने इसे जानवरों के व्यवहार और इंसानी अपराध के बीच गलत तुलना बताया। क्रिटिक्स का कहना है, कि क्रिमिनल एक्ट्स में इंसानी इरादा, कानूनी जिम्मेदारी और सजा शामिल होती है, जबकि जानवरों का व्यवहार इंस्टिंक्ट पर आधारित होता है।
दो पक्ष, दो राय-
हालांकि रम्या के समर्थकों का तर्क है, कि उनके पोस्ट को बहुत लिटरली लिया जा रहा है। उनका मानना है, कि रम्या ने सिर्फ कलेक्टिव या प्री-एम्प्टिव एक्शन की लॉजिक को चैलेंज करने की कोशिश की थी, न कि पब्लिक सेफ्टी के मुद्दे को नजरअंदाज किया। लेकिन दूसरी तरफ बड़ी संख्या में लोग इसे संवेदनहीन और उत्तेजक बयान मान रहे हैं, खासकर उन हालिया घटनाओं को देखते हुए, जहां आवारा कुत्तों के अटैक से लोगों में डर का माहौल बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट क्या कह रहा है-
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट इन दिनों स्ट्रे डॉग मैनेजमेंट से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा है। देश भर में आवारा कुत्तों के अटैक की घटनाएं बढ़ने और नगर निकायों द्वारा एनिमल बर्थ कंट्रोल और वैक्सीनेशन रूल्स को सही तरीके से लागू न करने को लेकर कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, कि जानवरों के व्यवहार का अंदाजा लगाना मुश्किल है और पब्लिक स्पेसेस में यह खतरा पैदा करता है। कोर्ट ने यह भी नोट किया, कि कुत्ते इंसानों के डर को सेंस कर सकते हैं और कुछ सिचुएशंस में एग्रेसिव हो सकते हैं।
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सोशल मीडिया की ताकत और जिम्मेदारी-
यह पूरा मामला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है, कि पब्लिक फिगर्स की सोशल मीडिया पर क्या जिम्मेदारी होती है। एक पोस्ट कैसे किसी सीरियस इश्यू को डिफ्लेक्ट कर सकता है और कैसे एनालॉजी का इस्तेमाल कभी-कभी उलटा पड़ जाता है। जहां एक तरफ फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन जरूरी है, वहीं सेंसिटिव मुद्दों पर बात करते वक्त शब्दों का चुनाव भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
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