Acid Attack Victim Job: तेज़ाब का एक छींटा पूरी ज़िंदगी बदल देता है, चेहरा, आंखें, आत्मविश्वास, सब कुछ। ये लोग न सिर्फ जिस्मानी दर्द झेलते हैं, बल्कि समाज की उपेक्षा भी सहते हैं। ऐसे में देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक बार फिर इन बहादुर लोगों के लिए आवाज़ उठाई है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पूछा, कि क्या तेज़ाब हमले के पीड़ितों को सरकारी नौकरियों और सार्वजनिक उपक्रमों में प्राथमिकता देकर उनका पुनर्वास किया जा सकता है।
Shaheen Malik की लड़ाई-
यह मामला तेज़ाब हमले की शिकार Shaheen Malik की जनहित याचिका पर सुना जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने अपने आदेश में कहा, कि अगर राज्यों को सरकारी नौकरी में आरक्षण देने में कोई व्यावहारिक दिक्कत है, तो कम से कम ज़रूरतमंद पीड़ितों को मासिक सम्मान राशि या जीवन-यापन भत्ता तो दिया जाए। अदालत ने यह भी कहा, कि राज्यों को यह अंतिम मौका दिया जा रहा है, कि वे अपना पक्ष स्पष्ट रूप से रखें।
हर पीड़ित की पूरी जानकारी मांगी-
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से कहा कि वे हर तेज़ाब हमले के पीड़ित की संक्षिप्त जानकारी दें, जिसमें उनकी शैक्षणिक योग्यता, वर्तमान रोज़गार की स्थिति, वैवाहिक स्थिति, चल रहे चिकित्सा उपचार और इलाज पर हुए या होने वाले खर्च का ब्यौरा शामिल हो। यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि अब तक इन पीड़ितों का कोई केंद्रीय रिकॉर्ड नहीं था।
मुकदमों में भी तेज़ी लाने के निर्देश-
पीठ ने यह भी नोट किया, कि उच्च न्यायालयों ने जिला अदालतों को तेज़ाब हमले के मामलों की सुनवाई प्राथमिकता से करने के निर्देश दे दिए हैं। मुख्य न्यायाधीशों से कहा गया है, कि वे निगरानी करने वाले न्यायाधीशों को इन मामलों की नियमित समीक्षा करने के लिए प्रेरित करें ताकि न्याय में देरी न हो।
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अंदर से पीड़ित लोग भी चाहते हैं न्याय-
याचिका में एक और अहम मांग है, जो लोग ज़बरदस्ती तेज़ाब पिलाए जाने से अंदरूनी अंगों की क्षति से पीड़ित हैं, उन्हें भी शारीरिक रूप से विकलांग माना जाए। जब सरकारी वकील ने कहा कि सरकार इस पर विचार कर रही है, तो अदालत ने सीधे कहा, “भारतीय न्याय संहिता तेज़ाब हमले और तेज़ाब पिलाने को एक जैसा अपराध मानती है। यही समानता विकलांग व्यक्ति अधिकार अधिनियम में भी लानी चाहिए।”
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