Sanatan Dharma
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    Sanatan Dharma: भारत में धर्म सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा है। यहां हमेशा से सवाल पूछने और सोचने की परंपरा रही है। एक सवाल जो सदियों से लोगों के मन में उठता रहा है, वो यह है, कि अगर भगवान पूरी दुनिया में हैं, सब जगह मौजूद हैं, तो फिर उनके अवतार सिर्फ भारत में ही क्यों हुए? राम, कृष्ण, नरसिंह जैसे सभी अवतार भारत की धरती पर ही क्यों आए? यह सवाल आज भी उतना ही जरूरी है जितना पहले था।

    वेदों में भगवान को कैसे बताया गया है-

    हमारे सबसे पुराने धर्मग्रंथ वेदों में भगवान को बिना किसी रूप वाला, जो कभी जन्मा नहीं और जो कभी मरता नहीं, ऐसा बताया गया है। वेदों के अनुसार, परमात्मा जन्म और मौत के चक्कर से बाहर है। अगर भगवान किसी इंसान के शरीर में जन्म लें, तो वो सीमित हो जाएंगे, लेकिन वेद कहते हैं, कि भगवान तो असीमित हैं। इसलिए वेदों में सीधे-सीधे अवतार की बात नहीं मिलती।

    अवतार का विचार कहां से शुरू हुआ-

    अवतार की कहानियां मुख्य रूप से पुराणों में मिलती हैं। इसकी वजह यह मानी जाती है, कि हर किसी के लिए गहरी दार्शनिक बातें समझना मुश्किल होता है। आम लोगों तक धर्म और अच्छी बातें पहुंचाने के लिए कहानियों का सहारा लिया गया। अवतार को यहां भगवान के जन्म के रूप में नहीं, बल्कि एक आदर्श इंसान के रूप में देखा जा सकता है, जो समाज को सही रास्ता दिखाता है।

    गीता में क्या लिखा है-

    गीता में कहा गया है, कि जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब धर्म की रक्षा के लिए शक्ति प्रकट होती है। कई विद्वान मानते हैं, कि यह असल में किसी का जन्म लेना नहीं, बल्कि चेतना का जागना है। जब समाज में बुराई बढ़ जाती है, तब इंसानों के अंदर से ही वो ताकत पैदा होती है, जो गलत के खिलाफ खड़ी होती है। यही सोच धीरे-धीरे अवतार की कहानियों में बदल गई।

    सिर्फ भारत में ही यह सोच क्यों बनी-

    भारत की संस्कृति में सवाल पूछना, सोचना और अनुभव से सीखना हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। यहां भगवान को बस मानने की बजाय उन्हें समझने की कोशिश हुई। योग, ध्यान और दर्शन की परंपराओं ने भगवान को समझाने के लिए अलग-अलग रूप और कहानियां बनाईं, जिन्हें बाद में अवतार कहा जाने लगा। भारत में आध्यात्मिकता सिर्फ धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका बन गई।

    असली दिक्कत कहां है-

    समस्या तब आती है, जब हम कहानियों को इतिहास मान लेते हैं और दर्शन को सिर्फ अंधी आस्था से बदल देते हैं। जब सवाल पूछना बंद हो जाता है, तो धर्म रूढ़िवादिता में बदलने लगता है। जबकि भारतीय दर्शन तो यही कहता है, कि सच को जानने के लिए दिमाग से सोचना जरूरी है, सिर्फ मान लेना काफी नहीं है।

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    तो क्या निकला-

    यह कहना, कि सभी भगवान असली अवतार हैं, अधूरा सच है और यह कहना, कि अवतार की बात बिल्कुल गलत है, यह भी पूरी तरह सही नहीं। वेद भगवान को बिना रूप का बताते हैं, पुराण उन्हें समझाने के लिए रूप देते हैं। दोनों का मकसद एक ही है, इंसान को अज्ञानता से निकालकर ज्ञान की तरफ ले जाना। असली बात यह है, कि हम सोचना बंद न करें और अपने विवेक से सही-गलत का फैसला करें।

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    By sumit

    मेरा नाम सुमित है और मैं एक प्रोफेशनल राइटर और जर्नलिस्ट हूँ, जिसे लिखने का पाँच साल से ज़्यादा का अनुभव है। मैं टेक्नोलॉजी और लाइफस्टाइल टॉपिक के साथ-साथ रिसर्च पर आधारित ताज़ा खबरें भी कवर करता हूँ। मेरा मकसद पढ़ने वालों को सही और सटीक जानकारी देना है।