Biogas From Kitchen Waste: हर भारतीय रसोई में हर दिन एक छोटा सा कूड़ेदान भरता है, सब्जियों के छिलके, बचा हुआ खाना, फलों के छिलके और सड़ी-गली चीजें। यह सब कूड़ा आंखों से ओझल होते ही किसी बड़े कचरे के ढेर में जा मिलता है, जहां सड़कर जहरीली गैसें हवा में घुलती रहती हैं। ऐसे वक्त में जब LPG की किल्लत और बढ़ती कीमतें हर घर की चिंता बन चुकी हैं, पुणे के एक इंजीनियर ने एक ऐसा सवाल पूछा, जिसने सब कुछ बदल दिया, क्या यही रसोई का कचरा खाना पकाने का ईंधन नहीं बन सकता?
एक सवाल जो रसोई से उठा-
IIT बॉम्बे से पढ़े प्रियदर्शन सहस्रबुद्धे कुछ साल पहले अपने परिवार के व्यवसाय में काम करते हुए, एक बात पर गौर करने लगे खाने के बाद कितना खाना बर्बाद होता है। पहले उन्होंने इस कचरे से खाद बनाने की कोशिश की लेकिन लगा, कि यह काफी नहीं है। इस जैविक कचरे में कुछ और भी था, एक छुपी हुई ताकत, जिसे अभी तक किसी ने पहचाना नहीं था।
कचरे में छुपा था ईंधन-
जब गहराई से खोज की तो उन्हें पता चला, कि रसोई का जैविक कचरा बैक्टीरिया की मदद से मीथेन गैस में बदल सकता है, वही गैस जो खाना पकाने के काम आती है। 2017 में यह सोच एक असली उत्पाद बन गई, जिसका नाम रखा Vaayu। यह एक छोटा घरेलू बायोगैस संयंत्र है, जो रसोई के जैविक कचरे को प्राकृतिक प्रक्रिया के जरिए मीथेन में बदलता है। यह गैस सीधे चूल्हे तक पाइप से पहुंचती है और बचा हुआ गाढ़ा तरल पदार्थ पौधों के लिए बढ़िया खाद बन जाता है।
घर से हुई शुरुआत, नतीजे चौंकाने वाले-
उन्होंने पहला प्रयोग अपने घर में किया। रोज के रसोई के कचरे से उनका संयंत्र हर दिन करीब 800 लीटर बायोगैस बनाने लगा, जो घर की खाना पकाने की जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा करने के लिए काफी था। परिवार ने हर साल कई LPG सिलेंडर की बचत की। लेकिन असली चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि लोगों की आदतें बदलना था।
पड़ोसियों को समझाना था सबसे कठिन काम-
शुरुआत में खुद अपनी इमारत के हर दरवाजे पर जाते और लोगों को गीला और सूखा कचरा अलग करने के लिए समझाते। कुछ दिन तो उन्होंने खुद पास के कूड़ेदानों से जैविक कचरा इकट्ठा किया, ताकि संयंत्र चलता रहे। धीरे-धीरे जब लोगों ने अपनी आंखों से देखा, कि रसोई का कूड़ा सच में गैस बन रहा है, तो हिचकिचाहट खत्म हो गई। आज उनकी इमारत से हर दिन 8 से 10 किलो जैविक कचरा इस संयंत्र में आता है।
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एक घर से सौ से ज्यादा घरों तक-
आज Vaayu संयंत्र पुणे, नासिक, हैदराबाद और औरंगाबाद में सौ से ज्यादा घरों में लगे हैं। ये संयंत्र मिलकर हर दिन करीब दो टन खाद्य कचरा प्रसंस्कृत करते हैं और हर साल सैकड़ों LPG सिलेंडर की बचत करते हैं। उन्होंने Vaayu Mitra नाम का एक समुदाय भी बनाया है, जहां टिकाऊ जीवनशैली अपनाने वाले लोग एक-दूसरे से सीखते हैं और कचरा उठाने वालों को प्रशिक्षित किया जाता है। उनका संदेश सीधा है, रसोई का कचरा फेंकने की चीज नहीं, बल्कि इस्तेमाल करने की चीज है।
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