Indian Economy: पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई और अब पश्चिम एशिया के हालात फिर से चिंताजनक हो गए हैं। दुनियाभर की नज़रें स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ पर टिकी हैं, वह संकरा समुद्री रास्ता जिससे दुनिया का एक बड़ा हिस्सा अपना तेल और गैस पाता है। इस मुद्दे पर रक्षा विशेषज्ञ पीके सहगल ने जो कुछ कहा, वह भारत के लिए चिंताजनक है।
“आने वाला समय बहुत भयानक होगा”-
रक्षा विशेषज्ञ पीके सहगल ने साफ शब्दों में कहा, कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ खुले या न खुले, दुनिया के लिए आने वाला समय बहुत कठिन होने वाला है। उन्होंने बताया, कि ईरान का बुनियादी ढांचा पूरी तरह तबाह हो चुका है। रिफाइनरियां, पाइपलाइन और बंदरगाह बर्बाद हो गए हैं। इन्हें फिर से खड़ा करने में कई साल लग सकते हैं। भारत ने फिलहाल के लिए कुछ इंतज़ाम कर लिया है, लेकिन लंबे समय में सबसे ज़्यादा नुकसान भारत को ही उठाना पड़ेगा।
भारत की निर्भरता-
सहगल ने आंकड़ों के साथ बताया, कि भारत किस हद तक पश्चिम एशिया पर निर्भर है-
| क्षेत्र | निर्भरता |
|---|---|
| एलपीजी आयात | 88 प्रतिशत |
| कच्चा तेल | 59 प्रतिशत |
| एलएनजी | 20 प्रतिशत |
| यूरिया/खाद का कच्चा माल | 40 प्रतिशत |
| जेनेरिक दवाओं का कच्चा माल | 35-40 प्रतिशत |
| प्लास्टिक उद्योग का कच्चा माल | 35-40 प्रतिशत |
| हीलियम (सेमीकंडक्टर के लिए) | 45 प्रतिशत |
| रेमिटेंस (प्रवासी भारतीयों से) | 65-70 अरब डॉलर बंद |
यानी भारत के किसान, उद्योग, दवा कंपनियां और यहां तक कि सेमीकंडक्टर का सपना सब कुछ इस संकट की चपेट में आ सकता है।
रणनीतिक नुकसान-
सहगल ने बताया, कि इस संघर्ष ने भारत की कई महत्वाकांक्षी रणनीतिक योजनाओं को भी तहस-नहस कर दिया है। इंडिया मिडिल ईस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी आईमैक व्यावहारिक रूप से खत्म हो गया है। यूएई-यूएसए-इंडिया-इज़रायल का यूटूआईटू गठबंधन भी बिखर गया है।
चाबहार बंदरगाह के ज़रिए अफगानिस्तान से भारत की सीधी कनेक्टिविटी अब बंद हो गई है। रूस और मध्य एशिया से व्यापार का सुगम रास्ता यानी नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर भी ठप पड़ गया है। इसके ऊपर से माल ढुलाई और बीमा शुल्क में भारी बढ़ोतरी होगी, जिसका असर आम नागरिकों की जेब पर पड़ेगा।
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भारत के लिए यह घड़ी गंभीर चिंतन की मांग करती है-
पीके सहगल की यह चेतावनी बताती है, कि पश्चिम एशिया का यह संकट भारत के लिए सिर्फ एक दूर देश की समस्या नहीं है, यह सीधे हमारी रसोई, खेत, अस्पताल और उद्योगों से जुड़ा है। सरकार को अभी से दीर्घकालिक विकल्प तलाशने होंगे।
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