Iran War: 28 फरवरी 2026 को जब ईरान के परमाणु ठिकानों पर मिसाइलें गिरीं, तो यह सिर्फ एक सैन्य हमला नहीं था। यह एक ऐसी चिंगारी थी, जिसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में आग लगा दी। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, खाद की आपूर्ति रुक गई है, केंद्रीय बैंक महंगाई और मंदी के बीच फंसे हैं और अमेरिका से जापान तक आम परिवार पेट्रोल पंप और किराना दुकान पर पहले से ज्यादा पैसे चुका रहे हैं। लेकिन सबसे अहम सवाल यह है, इस तबाही में कौन डूबेगा और कौन फायदा उठाएगा?
होर्मुज बंद और दुनिया थम गई-
होर्मुज जलसंधि आज दुनिया की सबसे संवेदनशील जगह बन चुकी है। इस संकरे रास्ते से हर रोज करीब दो करोड़ बैरल तेल गुजरता है और दुनिया में कहीं भी इतनी अतिरिक्त क्षमता नहीं है, कि इस कमी को पूरा किया जा सके। इसके अलावा दुनिया के कुल खाद निर्यात का 30 फीसदी हिस्सा, जिसमें यूरिया, अमोनिया और फॉस्फेट शामिल हैं, भी इसी रास्ते से जाता है। QatarEnergy ने ड्रोन हमलों के बाद उत्पादन रोक दिया, जिससे यूरोप में LNG की कीमतें 50 फीसदी तक उछल गईं।
तेल 70 से 120 डॉलर-
27 फरवरी को तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से कम थी। 9 मार्च तक यह उछलकर करीब 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई, जो 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। ईरान के नए सर्वोच्च नेता के नाम की घोषणा के अगले ही दिन बाजार में इतनी हलचल मची, कि कीमतें पल भर के लिए 120 डॉलर के पार चली गईं। फिलहाल यह 90 डॉलर के आसपास है, लेकिन अनिश्चितता बरकरार है।
अमेरिकी परिवारों की जेब पर सीधा वार-
अमेरिका में पेट्रोल की कीमत एक हफ्ते में 3 डॉलर से बढ़कर 3.48 डॉलर प्रति गैलन हो गई। एक औसत अमेरिकी परिवार हर साल गाड़ी में करीब 2,500 डॉलर का ईंधन भरता है, पेट्रोल 20 फीसदी महंगा होने का मतलब है, हर हफ्ते 10 डॉलर अतिरिक्त खर्च। Moody’s Analytics के मुताबिक, तेल में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी एक आम अमेरिकी परिवार की जेब से सालाना करीब 450 डॉलर और निकाल लेती है। ट्रंप के 2025 के टैक्स कटौती से मिले फायदे भी इस महंगाई की भेंट चढ़ सकते हैं।
आगे क्या होगा मंदी या महंगाई?
अगर जंग मार्च के अंत तक खत्म हो जाती है, तो अमेरिका की GDP वृद्धि दर 2026 की आखिरी तिमाहियों में 2 फीसदी से नीचे जा सकती है। लेकिन अगर संघर्ष लंबा खिंचा तो यह गिरकर महज 1 फीसदी रह सकती है। महंगाई के मोर्चे पर भी हालात चिंताजनक हैं, बेहतर स्थिति में भी यह 3.3 फीसदी और बुरी स्थिति में 4.1 फीसदी तक जा सकती है। अर्थशास्त्री इसकी तुलना 1970 के दशक के तेल संकट से कर रहे हैं।
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कौन डूबेगा, कौन उभरेगा?
इस संकट में नॉर्वे, रूस और कनाडा जैसे बड़े तेल निर्यातक देश फायदे में हैं। वहीं भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के ज्यादातर देश जो तेल आयात पर निर्भर हैं, सबसे ज्यादा तकलीफ झेल रहे हैं। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया मिलकर इस इलाके के 75 फीसदी तेल और 59 फीसदी LNG का आयात करते हैं, यानी इन देशों पर मार सबसे गहरी पड़ेगी। एक जंग, दो रास्ते और बीच में फंसी है दुनिया की आम जनता।
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