Seven Wonders of India: दुनिया के सात अजूबे तो आपने सुने होंगे ताजमहल, चीन की दीवार। लेकिन आज बात करते हैं अपने देश के “सेवन वंडर्स ऑफ इंडिया” की। वो सरकारी काम जिन पर जनता के करोड़ों रुपये लगे, लेकिन नतीजा देखकर दिल करे, कि रोएं या हंसें और सबसे बड़ा चमत्कार तो यही है, कि इतना पैसा आखिर गया कहां?
मीरा भाईंदर फ्लाईओवर भगवान से मिलाने की पक्की गारंटी-

100 करोड़ रुपये की लागत से बना मीरा भाईंदर फ्लाईओवर कोई साधारण पुल नहीं है, यह इंजीनियरिंग और आस्था का अनोखा संगम है। इस पर अगर आपने 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गाड़ी चलाई, तो भगवान से सीधी मुलाकात होने की पूरी उम्मीद है। यह पुल 100 करोड़ में बना है, इस पर सही-सलामत गुज़रना खुद किसी चमत्कार से कम नहीं।
AIIMS दरभंगा, बिहार 10 साल में गेट, बाकी पता नहीं-

बिहार के दरभंगा में ₹1261 करोड़ की लागत से AIIMS बनना था। सरकार ने खूब मेहनत की और पूरे 10 साल में गेट बनाकर तैयार कर दिया। लेकिन इमारत? वह भी अगले 100 साल में बन जाएगी, तब तक हमारे बच्चों के बच्चे वहाँ पढ़ने जाएंगे। सरकार की दूरदर्शिता की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है।
हैदराबाद राष्ट्रीय मत्स्य बोर्ड नक्शा था कुछ, बना कुछ और-

₹18.5 करोड़ में हैदराबाद में राष्ट्रीय मत्स्य बोर्ड का भवन बनना था। नक्शा देखकर लगता था, कि कुछ शानदार तैयार होगा। लेकिन जो बना वो “सादा, प्यारा और आकर्षक” निकला। इतना सादा, कि बाकी का पैसा शायद इसी सादगी को और निखारने में खर्च हो गया।
भोपाल का 90° पुल और बिहार शरीफ का घंटाघर-

भोपाल में ₹18 करोड़ खर्च करके एक ऐसा पुल बनाया गया, जिस पर 90 डिग्री का मोड़ है, पूरे देश में पहला और शायद आखिरी भी, क्योंकि कोई दोबारा ऐसी हिम्मत नहीं दिखाएगा। लोगों ने इसे खूब सराहा, किस भाव से सराहा यह सब जानते हैं। वहीं बिहार शरीफ में ₹40 लाख में एक घंटाघर बना जिसका नक्शा पेरिस और न्यूयॉर्क में शायद जचता। बिहार की भोली-भाली जनता के लिए इंजीनियरों ने सादगी को तरजीह दी और नतीजा सबके सामने है।
पुल के बीच में इमारत और बिना रास्ते का पुल-

कृष्णानगर केसरीखेड़ा में ₹74 करोड़ का फ्लाईओवर बना, लेकिन बीच में एक इमारत आ गई। इंजीनियरों की कोई गलती नहीं, बेचारे अपना काम कर रहे थे। किसी ने बीच में मकान बना दिया, तो वो भला क्या करते? और सातवाँ अजूबा है, बिहार के अररिया का पुल जो ₹3 करोड़ में बना। पुल तो बन गया बस जाने और आने का रास्ता नहीं बना। बिहार में मज़दूरी महँगी है, तो रास्ता बजट में फिट नहीं हुआ शायद।
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असली सवाल हँसें या रोएं?
इन सातों “वंडर्स” को देखकर एक ही सवाल मन में आता है, यह पैसा जनता का था। आपका और हमारा और इसका जवाब कोई नहीं देता। कोई जाँच नहीं, कोई जवाबदेही नहीं, बस अगला ठेका और अगला पैसा। यह कोई भूल नहीं है, यह एक पूरा तंत्र है, जो बखूबी चल रहा है, बस उनके लिए जो इसे चला रहे हैं।
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