Mumbai Metro Pillar Accident
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    Mumbai Metro Pillar Accident: मुंबई की चमचमाती मेट्रो लाइन के निर्माण के बीच एक दिल दहला देने वाला हादसा हो गया। कंस्ट्रक्शन साइट पर एक मेट्रो पिलर अचानक गिर पड़ा और एक शख्स की मौत हो गई। यह हादसा उस स्लैब से हुआ, जो सिर्फ एक दिन पहले ही इंस्टॉल की गई थी। एक दिन और वो ढह गई। सवाल यह है, कि आखिर कहां चूक हुई और क्या इसे सच में हादसा कहना सही है?

    कागजों पर सब ठीक था, जमीन पर जिंदगी चली गई-

    यह प्रोजेक्ट MMRDA यानी मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी के अंडर था। कंस्ट्रक्शन का काम RAGB कॉन्ट्रैक्टर और Milan Road Biltec कर रहे थे। सुपरविजन की जिम्मेदारी DB Hills LBG Consortium के पास थी। हर तरफ से कोई न कोई मॉनिटरिंग कर रहा था, ऑडिट हो रहे थे, साइन-ऑफ हो रहे थे, सुपरवाइजर्स आ-जा रहे थे। फिर भी, कल इंस्टॉल हुई स्लैब आज गिर गई।

    FIR, गिरफ्तारी और जुर्माना-

    हादसे के बाद सिस्टम ने अपनी रफ्तार दिखाई, 5 लोग अरेस्ट हुए, कॉन्ट्रैक्टर पर 5 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया और कंसल्टेंट पर 1 करोड़। लेकिन जो जिंदगी चली गई, उसके परिवार को मिला सिर्फ 5 लाख रुपये का मुआवजा। पांच लाख। एक इंसान की पूरी जिंदगी, उसके सपने, उसके परिवार का सहारा और सिस्टम ने उसकी कीमत लगाई सिर्फ ₹5 लाख। बाकी का 5 करोड़ कहां गया? किस खाते में जाएगा? क्या यह पैसा सच में पीड़ित परिवारों तक पहुंचेगा?

    Negligence को नॉर्मल बना दिया गया है-

    यह पहली बार नहीं है। कोई खड्डे में गिरता है, कोई अंडर-कंस्ट्रक्शन साइट पर स्टूपिड ड्यूटी के दौरान जान गंवाता है और हर बार सिस्टम का एक ही जवाब होता है, “कॉन्ट्रैक्टर की गलती है, जुर्माना लगा दो।” जैसे यह एक रेडीमेड स्क्रिप्ट हो। इंसान मरे, फाइन लगाओ, केस बंद करो। इस देश में यह इतना नॉर्मल हो चुका है, कि अब किसी को शॉक भी नहीं लगता। जब अथॉरिटी साइन-ऑफ करती है, ऑडिट पास होता है, सुपरवाइजर मौजूद होता है और तब भी पिलर गिरता है तो यह एक्सीडेंट नहीं। कुछ लोग इसे सीधे मर्डर कहते हैं और गलत भी नहीं हैं।

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    आम आदमी की जिंदगी की कीमत क्या है?

    असली सवाल यही है। क्या हम एक ऐसे सिस्टम में जी रहे हैं, जहां एक इंसान की मौत का सैटलमेंट सिर्फ 5 लाख रुपये है और बाकी करोड़ों सिस्टम की जेब में? जब तक जुर्माने की रकम सच में पीड़ितों तक नहीं पहुंचती, जब तक जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई नहीं होती और जब तक ऐसी घटनाओं को क्राइम नहीं माना जाता, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे। हम सब इंफ्रास्ट्रक्चर चाहते हैं, मेट्रो चाहते हैं, डेवलप्मेंट चाहते हैं, लेकिन उस डेवलप्मट की कीमत किसी बेगुनाह की जान नहीं होनी चाहिए।

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    By sumit

    मेरा नाम सुमित है और मैं एक प्रोफेशनल राइटर और जर्नलिस्ट हूँ, जिसे लिखने का पाँच साल से ज़्यादा का अनुभव है। मैं टेक्नोलॉजी और लाइफस्टाइल टॉपिक के साथ-साथ रिसर्च पर आधारित ताज़ा खबरें भी कवर करता हूँ। मेरा मकसद पढ़ने वालों को सही और सटीक जानकारी देना है।