Anarkali: इतिहास अपने नायकों के बारे में बहुत कुछ बताता है, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो रिकॉर्ड्स में नहीं, सिर्फ याद्दाश्त में जिंदा रहते हैं। अनारकली भी एक ऐसा ही नाम है, न कोई पक्की जन्मतिथि, न मौत का सबूत और न ही मुगल इतिहास के आधिकारिक पन्नों में कोई जिक्र। फिर भी, वो उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक कल्पनाओं में सबसे पहचानी जाने वाली महिलाओं में से एक हैं।
कहानी तो सबको पता है, एक खूबसूरत दरबारी नर्तकी, जो शहजादे सलीम से बेइंतहा मोहब्बत करती थी, बादशाह अकबर को नाराज़ कर बैठी और प्यार की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। कहते हैं कि उसे लाहौर के किले में दीवार के अंदर जिंदा चुनवा दिया गया था। यह सत्ता के खिलाफ इश्क की कहानी है, जवानी का साम्राज्य से टकराव है। लेकिन सच्चाई यह है कि न अकबर और न ही जहांगीर ने अपनी लिखाई में कभी अनारकली के अस्तित्व को स्वीकार किया। फिर भी, चार सदियों बाद आज भी वो फीकी नहीं पड़ी है।

मुगल रिकॉर्ड्स की खामोशी-
अगर अनारकली ने सच में मुगल दरबार को हिला दिया होता, तो रिकॉर्ड्स में जरूर कुछ होता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं मिलता। अकबर के शासनकाल का विस्तृत दस्तावेज़ीकरण अबुल फजल की ‘अकबरनामा’ में है। जहांगीर ने भी अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-जहांगीरी’ में अपनी जिंदगी, शौक, दुश्मनियां और विद्रोह, सब कुछ लिखा। टर्की पक्षियों से लेकर मलिक अंबर से उनकी दुश्मनी तक, जहांगीर ने बहुत कम छोड़ा। मगर अनारकली का कहीं नामोनिशान नहीं, न कोई गम, न खोया प्यार, न कोई फांसी पर चढ़ी नर्तकी, न शोक में बनाया गया कोई मकबरा। इतिहासकारों के लिए यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है।
लाहौर का मकबरा जो गुमनाम नहीं रहा-
फिर भी, लाहौर में अनारकली असली लगती है। पुराने शहर के दिल में एक साधारण-सा मुगलकालीन मकबरा खड़ा है, जिसे आज अनारकली बाजार के नाम से जाना जाता है। अंदर संगमरमर की एक कब्र है, जिस पर फारसी में एक शेर लिखा है- “काश! मैं अपने महबूब का चेहरा एक बार फिर देख पाती, तो कयामत तक अपने खुदा का शुक्र अदा करती।” इस पर दस्तखत हैं, मजनून सलीम अकबर के।
दो तारीखें अक्सर सामने आती हैं, 1599 ईस्वी, जिसे मौत का साल माना जाता है, और 1615 ईस्वी, जब यह इमारत बनकर तैयार हुई। लेकिन असलियत यह है कि कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड इस बात की पुष्टि नहीं करता कि वहां किसकी कब्र है। मकबरा मौजूद है, यकीन नहीं।
बाग, कब्र और बढ़ती हुई कहानी-
कई इतिहासकारों ने एक कम रोमांटिक व्याख्या दी है। अब्दुल्लाह चगताई और मुहम्मद बाकिर जैसे विद्वानों ने सुझाया कि यह इलाका असल में ‘बाग-ए-अनारकली’ यानी अनार के बाग के नाम से जाना जाता था। बाग के अंदर का मकबरा शायद किसी साधारण कुलीन महिला का रहा हो, जिसे लोककथाओं ने बाद में एक नाम, एक प्रेम कहानी और एक दुखद अंत दे दिया। यानी पहले अनार का फूल था, नर्तकी बाद में आई।

यूरोपीय यात्रियों ने बढ़ाई कहानी-
अनारकली का सबसे पहला लिखित जिक्र मुगल अभिलेखों में नहीं, बल्कि यूरोपीय यात्रियों के संस्मरणों में मिलता है। अंग्रेज व्यापारी विलियम फिंच, जो 1608 से 1611 के बीच लाहौर में रहा, ने स्थानीय अफवाहें रिकॉर्ड कीं कि अकबर ने शहजादे सलीम के साथ अफेयर के लिए अनारकली नाम की एक महिला को सजा दी। इसी तरह की कहानियां एडवर्ड टेरी और बिशप हर्बर्ट के वर्णनों में भी मिलती हैं। अहम बात यह है कि ये चश्मदीद गवाही नहीं थीं, बल्कि बाजारों में सुनी-सुनाई कहानियां थीं।
फ्रांसीसी इतिहासकार एलेन डेसुलियरेस ने बाद में तर्क दिया कि अनारकली की कहानी औपनिवेशिक कथा में बिल्कुल फिट बैठती थी: एक निरंकुश शासक जो एक बागी महिला को सजा देता है।
इम्तियाज़ अली ताज और फिक्शन का नियंत्रण-
मोड़ 1922 में आया। लाहौर के नाटककार इम्तियाज़ अली ताज ने अफवाहों को नाटक में बदल दिया, ‘अनारकली’। उर्दू रोमांस से प्रेरित होकर ताज ने एक बेबस महिला और ताकतवर शहजादे के बीच एक दुखद प्रेम कहानी लिखी। महत्वपूर्ण बात यह है कि मूल प्रकाशन में साफ लिखा था: यह फिक्शन है। लेकिन लोगों ने डिस्क्लेमर नहीं पढ़ा, वो तो बस भावनाओं को याद रखते रहे।
कहानी को और पक्का करने के लिए, ताज ने 1931 के संस्करण के लिए मशहूर कलाकार ए आर चुगताई से अनारकली का पोर्ट्रेट बनवाया। पहली बार उस बेचेहरा कहानी को एक चेहरा मिल गया। उस पल से अनारकली अफवाह नहीं रही, वो दिखाई देने लगी।
जब सिनेमा ने इतिहास को पीछे छोड़ दिया-
फिर फिल्में आईं। 1928 में एक मूक रूपांतरण आया, फिर 1935 और 1953 में और संस्करण। लेकिन के आसिफ की ‘मुगल-ए-आजम’ ने अनारकली को अमर बना दिया। मधुबाला के जादुई अभिनय, दिलीप कुमार के द्वंद्वग्रस्त सलीम और पृथ्वीराज कपूर के प्रभावशाली अकबर के साथ, किंवदंती ऑपरेटिक हो गई। भव्य सेट्स, शानदार संवाद और अविस्मरणीय संगीत ने एक अनुमानित कहानी को सांस्कृतिक सत्य में बदल दिया।

दिलचस्प बात यह है कि फिल्म ने अंत को नरम कर दिया। दीवारों के पीछे मरने के बजाय, अनारकली एक गुप्त रास्ते से बच निकलती है, एक बादशाह द्वारा बचाई गई जो अंततः दया चुनता है।
अनारकली क्यों गायब नहीं होती-
अनारकली इसलिए जिंदा है क्योंकि उसकी कहानी कई कालातीत जरूरतों को पूरा करती है। यह अकबर और सलीम के बीच वास्तविक तनाव को दर्शाती है। यह प्यार को विद्रोह के रूप में, जवानी को अवज्ञा के रूप में पेश करती है। सबसे बढ़कर, यह एक ऐसी महिला की कहानी है जो हथियारों से नहीं, बल्कि भावनाओं से साम्राज्य को चुनौती देती है।
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चाहे वो नादिरा बेगम हो, शरी-उन-निस्सा हो, साहिब-ए-जमाल हो, या कोई न हो, अनारकली सामूहिक लालसा का प्रतीक बन गई। इतिहास को शायद उसकी जरूरत नहीं थी, लेकिन संस्कृति को थी। और इसीलिए, मुगल रिकॉर्ड्स में अनुपस्थिति के बावजूद, अनारकली सांस लेती रहती हैl लाहौर के एक मकबरे में, पत्थर पर उकेरे एक फारसी शेर में, और एक श्वेत-श्याम फिल्म में जो बूढ़ी नहीं होती। कभी-कभी अमरता सच से नहीं, बल्कि विश्वास से आती है।
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