Harish Rana
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    Harish Rana: सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक ऐसा केस सुनवाई के लिए आया जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। 31 साल के हरीश राणा पिछले 13 सालों से परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में हैं और उनका परिवार लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट बंद करने की इजाजत मांग रहा है।

    जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने लगभग एक घंटे तक सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह केस सिर्फ एक परिवार की तकलीफ नहीं, बल्कि देश में एंड-ऑफ-लाइफ केयर और इंसानी गरिमा पर एक बड़ी बहस को जन्म दे चुका है।

    कोर्ट में परिवार की दर्द भरी गुहार-

    सुप्रीम कोर्ट ने इस हफ्ते की शुरुआत में जारी एक विस्तृत ऑर्डर में लिखा, कि जजों ने हरीश के माता-पिता और छोटे भाई से सीधे मुलाकात की थी। कोर्ट ने अपने ऑर्डर में नोट किया, “तीनों यानी पिता, माता और छोटा भाई, एक आवाज में और अपने दिलों में बहुत दर्द लेकर हमसे विनती की, कि जरूरी कदम उठाए जाएं, जिससे हरीश को अब और तकलीफ न सहनी पड़े।” परिवार ने कहा, कि अगर मेडिकल इंटरवेंशन अब मदद नहीं कर रहा, तो ट्रीटमेंट जारी रखना सिर्फ तकलीफ को “बिना किसी अच्छी वजह के” लंबा खींच रहा है।

    हियरिंग के दौरान, जजों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया, कि परिवार का कोई भी फैसला स्थिर, विचारशील और किसी पल भर की भावना से प्रेरित नहीं होना चाहिए। जस्टिस केवी विश्वनाथन ने एक हाइपोथेटिकल सिचुएशन रखी और पूछा, कि अगर परिवार बाद में अपना फैसला बदल दे और वो मेडिकल ओपिनियन के खिलाफ हो तो क्या होगा? जस्टिस पारदीवाला ने जवाब देते हुए संकेत दिया, कि मेडिकल बोर्ड की भूमिका तभी आएगी, जब परिवार की सहमति लिखित रूप में दर्ज हो जाए।

    पैसिव इच्छामृत्यु शब्द पर आपत्ति-

    परिवार की वकील राश्मि नंदकुमार ने कोर्ट के सामने कुछ प्रैक्टिकल मुद्दे भी उठाए। उन्होंने सुझाव दिया, कि हॉस्पिटल्स में ऐसे केसों के लिए पहले से नॉमिनेटेड डॉक्टर्स होने चाहिए, जिससे हर बार चीफ मेडिकल ऑफिसर्स को नए डॉक्टर्स अपॉइंट न करने पड़ें। उनका कहना था, कि इससे कोई समय बर्बाद नहीं होगा और संवेदनशील स्थितियों में फैसले जल्दी लिए जा सकेंगे।

    एक और अहम मुद्दा जूडिशियल ऑर्डर्स में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा का था। परिवार के वकील ने कोर्ट से अपील की, कि “पैसिव इच्छामृत्यु” शब्द की जगह इस प्रक्रिया को “लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट विड्रॉ/विदहोल्ड करना” कहा जाए। जस्टिस पारदीवाला ने टिप्पणी की, कि यह चिंता उनके दिमाग में “पहले दिन से ही” थी।

    कौन हैं Harish Rana-

    हरीश की स्थिति 20 अगस्त 2013 से शुरू हुई, जब वो चंडीगढ़ में एक पेइंग गेस्ट अकोमोडेशन में रहने वाले सिविल इंजीनियरिंग के स्टूडेंट थे। चौथी मंजिल की बालकनी से गिरने के बाद उन्हें गंभीर सिर की चोटें आईं और वो 100% क्वाड्रिप्लेजिक डिसेबिलिटी के शिकार हो गए। तब से वो बेड पर हैं, बोल नहीं सकते, सुन नहीं सकते, देख नहीं सकते, किसी को पहचान नहीं सकते और पूरी तरह से आर्टिफिशियल लाइफ सपोर्ट पर निर्भर हैं।

    कोर्ट को सौंपी गई एक जॉइंट रिपोर्ट में हरीश के पिता ने अपने बेटे की हालत का बयान किया, वो “बोल नहीं सकते, सुन नहीं सकते, देख नहीं सकते, किसी को पहचान नहीं सकते, या अपने आप खा नहीं सकते; पूरी तरह से आर्टिफिशियल लाइफ सपोर्ट पर निर्भर हैं, जिसमें फीडिंग ट्यूब शामिल है…”। पिता ने भविष्य को लेकर अपनी चिंता भी जाहिर की, कहा कि दोनों माता-पिता बूढ़े हो रहे हैं और अगर उन्हें कुछ हो गया, तो हरीश की देखभाल कौन करेगा।

    मेडिकल बोर्ड की राय-

    सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया, कि प्राइमरी और सेकेंडरी दोनों मेडिकल बोर्ड्स ने हरीश की जांच के बाद एक ही नतीजा निकाला है। डॉक्टर्स के अनुसार, ट्रीटमेंट बंद किया जा सकता है और “प्रकृति को अपना रास्ता चुनने दिया जाना चाहिए”। कोर्ट ने यह भी नोट किया, कि मेडिकल ओपिनियन के मुताबिक, हरीश सालों तक परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में रहेंगे, “पूरे शरीर में ट्यूब्स लगी रहेंगी”, और रिकवरी या नॉर्मल लाइफ की कोई उम्मीद नहीं है।

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    परिवार की कानूनी लड़ाई लंबी और भावनात्मक रूप से थकाऊ रही है। उनकी याचिका को पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था, जिसने कहा था, कि फीडिंग ट्यूब हटाना एक्टिव इच्छामृत्यु के बराबर होगा, जो कानून के तहत प्रतिबंधित है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार है, जो न सिर्फ हरीश की किस्मत तय करेगा, बल्कि भारत में एंड-ऑफ-लाइफ केयर से जुड़े व्यापक सिद्धांतों को भी आकार देगा।

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    By sumit

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