Atharva Chaturvedi Supreme Court: उम्र सिर्फ एक नंबर है, यह कहावत जबलपुर के 19 साल के अथर्व चतुर्वेदी ने साबित कर दिखाई। फरवरी की एक दोपहर, जब सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्य कांत की बेंच उठने वाली थी, तभी एक युवा आवाज गूंजी “सर, दस मिनट और दीजिए।” दस मिनट बाद कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला सुना दिया।
आर्टिकल 142 का हवाला देते हुए नेशनल मेडिकल कमीशन और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया गया, कि NEET क्वालिफाइड इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन (EWS) के कैंडिडेट्स को प्रोविजनल MBBS एडमिशन दिया जाए। अथर्व के लिए यह डॉक्टर बनने के सपने में ऑक्सीजन जैसा था, जो लगभग दम तोड़ चुका था।
NEET क्लियर किया, फिर भी नहीं मिली सीट-
अथर्व ने दो बार NEET क्लियर किया और 530 मार्क्स स्कोर किए। लेकिन उन्हें प्राइवेट कॉलेजों में EWS कोटे के तहत MBBS की सीट नहीं मिल पाई। क्योंकि मध्य प्रदेश की रिजर्वेशन सिस्टम के अनुसार, EWS पॉलिसी को प्राइवेट इंस्टीट्यूशंस तक नहीं बढ़ाया गया था। यह एक ऐसा झटका था, जो किसी भी मेहनती स्टूडेंट के सपनों को चकनाचूर कर सकता था। लेकिन अथर्व ने हार नहीं मानी। उन्होंने फैसला किया, कि अगर सिस्टम उनके साथ नहीं है, तो वे खुद ही अपनी लड़ाई लड़ेंगे।
NDTV के मुताबिक, जब जबलपुर हाई कोर्ट में उन्होंने खुद अपना केस अर्ग्यू किया, तो जज कहा, “तुम्हें वकील बनना चाहिए, डॉक्टर नहीं। तुम गलत फील्ड में हो।” लेकिन अथर्व की मंजिल तो कुछ और थी। वह डॉक्टर बनना चाहते थे और इसके लिए वह कोर्ट तक जाने को तैयार थे।
बायोलॉजी के बीच सीखा लॉ-
अथर्व वैसे लड़के नहीं हैं, जिन्हें सुनकर “कॉन्स्टिट्यूशनल लिटिगेशन” जैसे शब्द याद आएं। उनकी उम्र के बाकी लड़कों की तरह वे भी तारक मेहता का उल्टा चश्मा देखते हैं। लेकिन फर्क यह है, कि उन्होंने इंजीनियरिंग और मेडिकल दोनों एंट्रेंस एग्जाम क्लियर किए और आखिर में बायोलॉजी चुनी। उनके पिता मनोज चतुर्वेदी एक वकील हैं। कोविड लॉकडाउन के दौरान अथर्व ने वर्चुअल हियरिंग्स और कोर्टरूम डिसिप्लिन को ध्यान से देखा।
मनोज चतुर्वेदी कहते हैं, “मेरे बेटे ने कभी लॉ की पढ़ाई नहीं की। लेकिन उसने सब कुछ देखा। कितना बोलना है, कब चुप रहना है। असल में, उसने मुझे सिखाया, कि पिटीशन कैसे स्कैन करें और अपलोड करें।”
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खुद तैयार की पिटीशन, खुद लड़ा केस-
अथर्व ने सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट से स्पेशल लीव पिटीशन का फॉर्मेट डाउनलोड किया, जजमेंट्स को पढ़ा, खुद अपनी पिटीशन ड्राफ्ट की और रजिस्ट्री ऑब्जेक्शन को ठीक करने के बाद 6 जनवरी को ऑनलाइन फाइल कर दी। यह काम कोई सीनियर लॉयर भी इतनी कम उम्र में नहीं कर पाता। उनके पिता मित्रा मैडम और भारती मैडम को क्रेडिट देते हैं, जिन्होंने अथर्व का कॉन्फिडेंस बिल्ड किया। “इंग्लिश के नजरिए से, यह एक टर्निंग पॉइंट था।
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अब वह MBBS की पढ़ाई करेंगे और अपने डॉक्टर बनने के सपने को पूरा करेंगे। लेकिन उनकी यह जीत हमेशा याद रखी जाएगी, एक 19 साल के लड़के ने सुप्रीम कोर्ट में खुद अपना केस लड़ा और जीत गया।



