Robotic Cockroach: जब भी हम रोबोट्स के बारे में सोचते हैं, तो दिमाग में कोई धातु की मशीन आती है, लेकिन Germany की कंपनी Biotactics और उनके रिसर्चर्स ने कुछ ऐसा बना दिया है, जो विज्ञान की किताबों से निकलकर असल ज़िंदगी में आ गया लगता है। उन्होंने एक जिंदा कॉकरोच को ही रोबोट में तब्दील कर दिया है। इसे Bio-hybrid Robot कहा जा रहा है और यह तकनीक ड्रोन से कहीं ज़्यादा उन्नत और चालाक मानी जा रही है।
कैसे काम करता है यह जिंदा-मशीन का मेल?
Researchers ने मेडागास्कर हिसिंग कॉकरोच यानी एक खास प्रजाति के कॉकरोच का इस्तेमाल किया है। इनकी पीठ पर एक बेहद छोटा “backpack” लगाया जाता है, जिसमें माइक्रो-सर्किट और सेंसर्स होते हैं। इस बैकपैक में अल्ट्रा-थीन सोलर सेल्स भी लगे होते हैं, जो रोशनी से चार्ज होते रहते हैं, यानी बैटरी खत्म होने की चिंता नहीं।
सबसे दिलचस्प बात यह है, कि कॉकरोच के एंटेना और नसों से तार जोड़े जाते हैं। जब बैकपैक से हल्का बिजली का संकेत भेजा जाता है, तो कॉकरोच को लगता है, कि उसके रास्ते में कोई रुकावट है और वो उसी दिशा में मुड़ता है, जो रिसर्चर चाहता है। यानी जानवर खुद चलता है, मशीन बस उसकी दिशा तय करती है।
Drone से बेहतर क्यों है यह कीड़ा?
Drone बड़ा होता है, शोर करता है और पहचाना जा सकता है। लेकिन यह रोबोटिक कॉकरोच इतना छोटा है, कि किसी भी दरार, दीवार की संधि या मलबे के नीचे से आसानी से निकल सकता है। देखने में यह बिल्कुल असली कीड़े जैसा लगता है इसलिए इसे पहचान पाना लगभग नामुमकिन है। साथ ही ड्रोन को उड़ने के लिए बहुत ऊर्जा चाहिए, जबकि यहां कीड़ा खुद चलता है और मशीन को सिर्फ उसकी दिशा नियंत्रित करनी पड़ती है। यानी ऊर्जा की बचत भी, और काम भी ज़्यादा।
कहां होगा इसका इस्तेमाल?
इस तकनीक के सबसे बड़े उपयोग जासूसी और निगरानी में देखे जा रहे हैं। दुश्मन के इलाकों में या बंद कमरों में बिना किसी को खबर हुए झांकने के लिए यह एकदम सटीक है। इसके अलावा भूकंप या इमारत गिरने जैसी आपदाओं में मलबे के नीचे दबे लोगों को ढूंढने में भी यह बेहद कारगर साबित हो सकता है। परमाणु संयंत्रों जैसी उन जगहों की निगरानी में भी इसे उपयोगी माना जा रहा है जहाँ इंसान का जाना खतरनाक हो।
लेकिन सवाल भी उठ रहे हैं-
Animal राइट्स कार्यकर्ताओं का कहना है, कि किसी जीवित प्राणी को इस तरह “zombie” बनाना नैतिक रूप से गलत है। वहीं तकनीकी विशेषज्ञों की चिंता यह है, कि अगर सिग्नल टूट जाए, तो कॉकरोच अपनी मर्ज़ी से कहीं भी जा सकता है, जिससे संवेदनशील जानकारी लीक होने का खतरा बना रहता है। यह तकनीक जितनी कमाल है, उतनी ही ज़िम्मेदारी भी मांगती है।



