Right to Recall: बुधवार को संसद के बजट सेशन 2026 में आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने एक ऐसा मुद्दा उठाया, जो हर आम वोटर के दिल की बात है। उन्होंने भारत में “राइट टू रिकॉल” यानी वापस बुलाने के अधिकार की मांग की और कहा, कि वोटर्स को सिर्फ नेताओं को चुनने का ही नहीं, बल्कि खराब परफॉर्मेंस करने वाले नेताओं को हटाने का भी अधिकार होना चाहिए। राघव चड्ढा का सवाल साफ था, अगर कोई नेता पांच साल तक ठीक से काम नहीं कर रहा, तो वोटर्स को उसे बर्दाश्त करने पर क्यों मजबूर किया जाए?
क्या है राइट टू रिकॉल का कॉन्सेप्ट-
राघव चड्ढा ने अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट करते हुए समझाया, कि राइट टू रिकॉल एक ऐसा मैकेनिज्म है, जो वोटर्स को अपने चुने हुए प्रतिनिधि को उसके कार्यकाल खत्म होने से पहले ही हटाने की ताकत देता है, अगर वह अपनी जिम्मेदारियां पूरी करने में फेल हो जाए। उन्होंने कहा, कि वोटर्स को किसी को ऑफिस में वोट देकर भेजने का अधिकार है, तो उन्हें उसे ऑफिस से वापस बुलाने का भी अधिकार होना चाहिए।
If voters can HIRE a neta, they should be able to FIRE the neta too.
— Raghav Chadha (@raghav_chadha) February 11, 2026
If Indian voters have the Right to Elect, they should have the ‘RIGHT TO RECALL’ too.
Right to Recall is a mechanism that empowers voters to de-elect an elected representative, before their term ends, if they… pic.twitter.com/6mB4gpQKPu
AAP के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने तर्क दिया, कि अगर हम राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और जज का इम्पीचमेंट कर सकते हैं, सरकार के खिलाफ मिड-टर्म में नो कॉन्फिडेंस मोशन ला सकते हैं, तो फिर वोटर्स को नॉन-परफॉर्मिंग सांसद या विधायक को पूरे पांच साल तक झेलने पर क्यों मजबूर किया जाए?
प्रोफेशन में 5 साल की खराब परफॉर्मेंस बर्दाश्त नहीं-
संसद के 11वें दिन सदन को संबोधित करते हुए राघव चड्ढा ने कहा, कि ऐसा कोई प्रोफेशन नहीं है, जहां आप पांच साल तक खराब परफॉर्मेंस करें और कोई नतीजा न हो। उन्होंने बताया, कि भारतीय नागरिकों को अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार तो है, लेकिन फिलहाल उनके पास टर्म के बीच में उन्हें सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराने का कोई औपचारिक प्रोसेस नहीं है। दिलचस्प बात यह है, कि दुनिया भर में दो दर्जन से ज्यादा डेमोक्रेसी में, जिनमें अमेरिका और स्विट्जरलैंड शामिल हैं, वोटर्स द्वारा शुरू किए गए रिकॉल के कुछ न कुछ प्रावधान हैं।
मिसयूज रोकने के लिए क्या होंगे सेफगार्ड्स-
राघव चड्ढा ने स्वीकार किया, कि भारत में इस तरह के सिस्टम के मिसयूज को रोकने के लिए कुछ सेफगार्ड्स जरूरी हैं। उन्होंने कुछ अहम सुझाव दिए। पहला, चुनाव के बाद अठारह महीने की कूलिंग ऑफ पीरियड होनी चाहिए। दूसरा, किसी भी रिकॉल वोटिंग से पहले कम से कम 35-40 फीसदी वोटर्स को वेरिफाइड रिकॉल पिटीशन को सपोर्ट करना होगा।
तीसरा, रिकॉल सिर्फ साबित दुराचार, करप्शन या ड्यूटी की गंभीर उपेक्षा के मामलों में ही हो और चौथा, कोई भी रिकॉल तभी सफल माना जाएगा, जब फाइनल वोटिंग में 50 फीसदी से ज्यादा वोटर्स हटाने के पक्ष में हों।
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यह है सिटीजन एम्पावरमेंट-
राघव चड्ढा ने कहा, कि यह सिटीजन एम्पावरमेंट है। इससे पार्टियों पर दबाव बनेगा, कि वे परफॉर्मर्स को टिकट दें, करप्शन कम होगा और डेमोक्रेसी फिर से अकाउंटेबिलिटी की तरफ वापस आएगी। यह प्रस्ताव एक ऐसा कदम है, जो वोटर्स को सिर्फ चुनने की नहीं, बल्कि हटाने की भी ताकत देता है और इससे राजनीतिक पार्टियां ज्यादा जवाबदेह उम्मीदवारों को नॉमिनेट करने के लिए प्रेरित होंगी।
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