Sakat Chauth 2026: माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला सकट चौथ का पर्व देशभर में बेहद श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है। सकट चौथ 6 जनवरी की सुबह 8 बजे शुरु होगा। यह व्रत विशेष रूप से माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और समृद्धि के लिए रखती हैं। इस दिन भगवान गणेश की आराधना का विशेष महत्व है और महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखकर शाम को विधि-विधान से पूजा करती हैं।
सकट चौथ का धार्मिक महत्व-
सकट चौथ को संकष्टी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान गणेश की उपासना करने से घर से सभी संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह से लेकर रात में चंद्रोदय तक बिना जल ग्रहण किए व्रत का पालन करती हैं। शाम के समय गणपति बप्पा की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और सकट चौथ की कथा सुनी जाती है।
2026 में सकट चौथ के शुभ मुहूर्त-
सकट चौथ की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व है। इस वर्ष पूजा के लिए चार विशेष मुहूर्त निर्धारित हैं। सुबह 11:09 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक लाभ-उन्नति का मुहूर्त रहेगा। इसके बाद 12:27 से 01:45 बजे तक अमृत मुहूर्त होगा जो सर्वोत्तम माना जाता है। दोपहर 03:03 बजे से 04:21 बजे तक शुभ मुहूर्त और शाम 07:21 बजे से 09:03 बजे तक पुनः लाभ मुहूर्त में पूजा की जा सकती है।
पूजा सामग्री और तैयारी-
सकट चौथ की पूजा के लिए गणेश जी की प्रतिमा, लाल फूल, 21 गांठ वाली दूर्वा, लकड़ी की चौकी, पीला कपड़ा, गाय का घी, धूप-दीप, गंगाजल, रोली, मौली, हल्दी, सिंदूर और मेहंदी की आवश्यकता होती है। भोग के लिए गुड़ और तिल के 11 या 21 लड्डू, मोदक, शकरकंद और मौसमी फल रखें। चांद को अर्घ्य देने के लिए कलश में दूध, चीनी, सफेद तिल और इत्र रखना न भूलें।
पूजा की संपूर्ण विधि-
व्रत वाले दिन सूर्योदय से पहले स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। संभव हो तो लाल रंग के कपड़े पहनें। हाथ में अक्षत और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें और भगवान गणेश को अर्पित करें। शाम को पुनः स्नान के बाद घी का दीपक जलाएं, देवी-देवताओं को तिलक लगाएं और गणेश मंत्रों का जाप करें। सकट चौथ की कथा सुनने के बाद आरती करें और भोग लगाएं।
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चंद्रमा को अर्घ्य देने की विधि-
रात में चंद्रोदय के बाद चांद को विशेष रूप से तैयार किए गए जल से अर्घ्य दें। इस जल में गंगाजल, कच्चा दूध, सफेद तिल, अक्षत और पुष्प मिलाएं। अर्घ्य देने के बाद धूप-दीप दिखाएं, भोग लगाएं और तीन बार परिक्रमा करें। इसके बाद जल ग्रहण करके अपना व्रत पूरा करें।
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