Ayushman Card in Haryana
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    Ayushman Card in Haryana: हरियाणा की गरीब जनता के लिए एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना, जो गरीबों के लिए मुफ्त इलाज का सबसे बड़ा जरिया है, अब संकट में फंस गई है। हरियाणा के 650 निजी अस्पतालों ने 7 अगस्त से आयुष्मान कार्ड धारकों का इलाज बंद करने की चेतावनी दे दी है। यह निर्णय उन लाखों परिवारों के लिए एक बड़ा झटका है, जो सालाना 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज पर निर्भर हैं।

    इंडियन मेडिकल एसोसिएशन यानी आईएमए का कहना है, कि हरियाणा सरकार पर 400 से 500 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है। अस्पतालों की फाइनेनशियल कंडीशन इतनी खराब हो गई है, कि वे अब मरीजों का इलाज करने में असमर्थ हैं। यह सिचुएशन न केवल गरीब मरीजों के लिए चिंता का विषय है। बल्कि हेल्थकेयर सिस्टम की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करती है।

    आयुष्मान भारत-

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई आयुष्मान भारत योजना को दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना कहा जाता है। इस स्कीम का मूल उद्देश्य था गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को क्वालिटी हेल्थकेयर मुहैया कराना। लेकिन इम्प्लीमेंटेशन लेवल पर आने वाली प्रॉब्लम्स ने इस अच्छी इनीशिएटिव को एक बड़े क्राइसिस की तरफ धकेल दिया है।

    हरियाणा में खासकर रेवाड़ी जिले की स्थिति गंभीर है, जहां लगभग 10 लाख कार्ड धारक हैं। इन लोगों में से अधिकतर ऐसे हैं, जो महंगे प्राइवेट हॉस्पिटल्स में इलाज करवाने की फाइनेनशियल कैपेसिटी नहीं रखते। अगर प्राइवेट हॉस्पिटल्स से कोऑपरेशन बंद हो जाता है, तो यह लोग कहां जाएंगे?

    पैसा न मिले तो इलाज कैसे?

    रेवाड़ी के आईएमए डिस्ट्रिक्ट प्रेसिडेंट डॉक्टर दीपक शर्मा का कहना है, कि जिले के 25 निजी अस्पतालों का करोड़ों रुपये का पेमेंट पेंडिंग है। उनका कहना है, “हम गरीबों का इलाज करना चाहते हैं, लेकिन सरकार सिर्फ आश्वासन देती है, पेमेंट नहीं।” यह स्टेटमेंट हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स की जेन्युइन प्रॉब्लम को दर्शाता है।

    अस्पतालों का कहना है कि देरी से पेमेंट मिलने के कारण उनकी ऑपरेशनल कॉस्ट्स मीट करना मुश्किल हो रहा है। स्टाफ की सैलरीज, मेडिसिन्स की कॉस्ट, और इक्विपमेंट मेंटेनेंस के लिए पैसे नहीं हैं। छोटे हॉस्पिटल्स तो कर्ज में डूब गए हैं। इस फाइनेनशियल क्रंच के कारण कई अस्पताल बंद होने के कगार पर हैं।

    मरीजों की दुविधा-

    अगर प्राइवेट हॉस्पिटल्स आयुष्मान स्कीम से बाहर निकल जाते हैं, तो मरीजों को गवर्नमेंट हॉस्पिटल्स का रुख करना पड़ेगा। लेकिन गवर्नमेंट हेल्थकेयर इन्फ्रास्ट्रक्चर की कंडीशन सबको पता है। लंबी क्यूज, लिमिटेड रिसोर्सेज और ओवरक्राउडेड वार्ड्स में क्वालिटी ट्रीटमेंट मिलना एक बड़ी चुनौती है।

    खासकर कैंसर, हार्ट सर्जरी, और न्यूरोलॉजिकल ट्रीटमेंट्स जैसे कॉम्प्लिकेटेड केसेज के लिए स्पेशलाइज्ड केयर की जरूरत होती है। गवर्नमेंट हॉस्पिटल्स में इन सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में सीरियस पेशेंट्स का क्या होगा? यह क्वेश्चन हेल्थकेयर सिस्टम की फंडामेंटल प्रॉब्लम्स पर रोशनी डालता है।

    आईएमए की नाराजगी-

    आईएमए के अनुसार न केवल पेमेंट में देरी हो रही है, बल्कि क्लेम प्रोसेस भी बहुत कॉम्प्लिकेटेड है। लो रीइम्बर्समेंट रेट्स और एडमिनिस्ट्रेटिव हैसल्स ने हॉस्पिटल्स की प्रॉब्लम्स बढ़ा दी हैं। छोटे हॉस्पिटल्स के लिए तो यह प्रोसेस हैंडल करना और भी मुश्किल है। क्योंकि उनके पास डेडिकेटेड एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ नहीं है।

    एसोसिएशन का कहना है, कि करेंट पेमेंट स्ट्रक्चर सस्टेनेबल नहीं है। हॉस्पिटल्स को महीनों तक पेमेंट का इंतजार करना पड़ता है, जबकि उनकी इमीडिएट फाइनेनशियल ऑब्लिगेशन्स हैं। यह सिचुएशन हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स को डिमोटिवेट करती है और अल्टीमेटली पेशेंट्स को सफर करना पड़ता है।

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    स्वास्थ्य या बचत?

    स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है, कि पेंडिंग पेमेंट प्रोसेस चल रही है, लेकिन हॉस्पिटल्स को महीनों का इंतजार करना पड़ रहा है। यह स्लो ब्यूरोक्रेटिक प्रोसेस हेल्थकेयर सेक्टर में कॉन्फिडेंस क्राइसिस पैदा कर रही है। अब सभी की नजरें मुख्यमंत्री सैनी पर हैं, कि वे इस क्राइसिस को कितनी जल्दी रिजॉल्व करते हैं।

    कांग्रेस ने भी केंद्र सरकार की फाइनेनशियल पॉलिसीज पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्ष का कहना है, कि यह सिचुएशन सरकार की मिसप्लेस्ड प्राइऑरिटीज को दर्शाती है। हेल्थ सेक्टर के लिए एडीक्वेट बजट एलोकेशन नहीं करना और फिर इम्प्लीमेंटेशन में डिलेज होना यह दिखाता है, कि हेल्थकेयर सिर्फ पॉलिटिकल रेटॉरिक है, जेन्युइन प्राइऑरिटी नहीं।

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