Raksha Temples: श्रीरामो रामो रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने। यह श्लोक कहता है, कि भगवान राम का नाम एक बार लेना विष्णु के सहस्र नाम के बराबर है। लेकिन जिस परंपरा ने राम को भगवान बनाया, उसी ने उनके विरोधियों की याद भी संजोकर रखी है।
हिंदू धर्म एक ऐसी सभ्यता है, जहां महाकाव्यों के खलनायकों को मिटाया नहीं गया, बल्कि उन्हें याद रखा गया है। कभी-कभी तो श्रद्धा के साथ। असुर और राक्षस, जो कभी देवताओं के खिलाफ खड़े थे, आज भी कई मंदिरों में पूजे जाते हैं। यह कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि हिंदू दृष्टिकोण का प्रतिबिंब है, जो सभी जीवों में दिव्य तत्व देखता है और मानता है, कि धर्म एकतरफा नहीं है।
बिसरख गांव में रावण मंदिर-

टाइम्सलाइफ के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के बिसरख गांव को रावण की जन्मभूमि माना जाता है। गांव का नाम रावण के पिता विश्रवा से आता है। जहां पूरे भारत में दशहरा पर रावण की हार का जश्न मनाते हैं, वहीं बिसरख में उसे एक विद्वान और शिव भक्त के रूप में पूजा जाता है। यहां के रावण मंदिर में पुतले जलाने की बजाय स्थानीय लोग उसकी आत्मा की शांति के लिए रीति-रिवाज करते हैं। उनका मानना ,है कि रावण का मज़ाक उड़ाना दुर्भाग्य लाता है। मंदिर की बनावट अभी भी अधूरी है, जो इस मान्यता को दर्शाती है, कि रावण का मंदिर कभी पूरा नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी कहानी खुद इंसानी चेतना में अधूरी है।
मध्य प्रदेश का रावणग्राम-
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में रावणग्राम नाम का गांव है, जहां आज भी रावण की पूजा होती है। यहां 10 फीट लंबी रावण की मूर्ति स्थापित है। ग्रामीण दशहरा पर विशेष प्रार्थनाएं करते हैं, उसकी मृत्यु का जश्न मनाने के लिए नहीं, बल्कि उसकी शक्ति और बुद्धि का सम्मान करने के लिए। स्थानीय लोग रावण को खलनायक नहीं, बल्कि एक महान राजा, वेदों के ज्ञाता और शिव के परम भक्त के रूप में देखते हैं।
एरविकुलंगरा भगवती मंदिर-
एर्नाकुलम के एरविकुलंगरा भगवती मंदिर में धर्म और अधर्म दोनों का एक साथ सम्मान किया जाता है। यहां देवी भगवती के साथ-साथ असुर राजा दारिक की भी पूजा होती है। पौराणिक कथा के अनुसार, दारिक को अजेयता का वरदान मिला था और देवी भद्रकाली को उसका वध करना पड़ा। फिर भी उसे मिटाने की बजाय, मंदिर उसकी याद को जारी रखता है, उसकी आत्मा को शांत करने के लिए रीति-रिवाज करता है।
कोट्टियूर मंदिर और महिषासुर-
कन्नूर के कोट्टियूर मंदिर का संबंध असुर महिषासुर से है। हालांकि महिषासुर को देवी पुराणों में दुर्गा द्वारा मारे गए राक्षस के रूप में याद किया जाता है, केरल की कुछ परंपराएं उसकी स्मृति को मंदिर के त्योहारों के दौरान सम्मान देती हैं। इन रीति-रिवाजों में महिषासुर का मज़ाक नहीं उड़ाया जाता, बल्कि देवी की पूजा से पहले उसे भेंट चढ़ाई जाती है।
दुर्योधन का मंदिर-

केरल के मलनाड में पोरुवझी पेरुविरुथी मलनाड मंदिर दुर्योधन को समर्पित है, यह इस तरह का एकमात्र ज्ञात मंदिर है। स्थानीय कथा कहती है, कि जब दुर्योधन पांडवों की खोज में यहां पहुंचा, तो ग्रामीणों ने उसके साथ सज्जनता से व्यवहार किया। कृतज्ञता में उसने उन्हें भूमि और सुविधाएं प्रदान कीं। आज भी उसके सम्मान में अनुष्ठान किए जाते हैं और मंदिर का त्योहार हजारों लोगों को आकर्षित करता है।
आंध्र प्रदेश में हिरण्यकश्यप की याद-
आंध्र प्रदेश का अहोबिलम मुख्यतः एक नरसिंह तीर्थ है, जहां विष्णु के नर-सिंह अवतार ने असुर राजा हिरण्यकश्यप का वध किया था। फिर भी विशाल मंदिर परिसर के भीतर हिरण्यकश्यप के वंश, जिसमें उसका पुत्र प्रह्लाद भी शामिल है, को सम्मान के साथ याद किया जाता है। कुछ स्थानीय परंपराएं हिरण्यकश्यप को केवल अत्याचारी नहीं, बल्कि ब्रह्मा के समर्पित भक्त के रूप में सम्मान देती हैं।
क्यों होती है राक्षसों की पूजा?
राक्षसों की पूजा एक गहरा प्रश्न उठाती है, क्यों कोई संस्कृति अपने खलनायकों को सम्मान देगी? उत्तर हिंदू विचारधारा की समावेशी प्रकृति में निहित है। द्वैतवादी परंपराओं के विपरीत, जहां अच्छे और बुरे शाश्वत शत्रु हैं, हिंदू दर्शन दोनों को एक ही दिव्य सत्ता की अभिव्यक्ति के रूप में देखता है। असुर और देव दोनों कश्यप की संतान हैं, एक ही ब्रह्मांडीय गर्भ से जन्मे हैं।
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राक्षसों की पूजा करके समुदाय बुराई का जश्न नहीं मना रहे हैं, बल्कि धर्म की जटिलता को स्वीकार कर रहे हैं। रावण, दुर्योधन, महिषासुर और हिरण्यकश्यप दोषी प्राणी थे, फिर भी वे विद्वान, शक्तिशाली और अपनी महत्वाकांक्षाओं में गहरे रूप से मानवीय भी थे। उनके मंदिर हमें याद दिलाते हैं, कि इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा जाता है, लेकिन स्मृति सभी की होती है।
यह हिंदू सभ्यता की विशिष्टता है, यहां जीत और हार दिव्यता तय नहीं करते और पूजा नैतिकता के साथ-साथ स्मृति और सम्मान के बारे में भी है। ये मंदिर हमें बताते हैं, कि धर्म एकतरफा नहीं है और ब्रह्मांडीय नाटक में हर पात्र की अपनी भूमिका है।
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