Pitru Paksha 2025: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण अवधि है, जो हमारे जीवन में पूर्वजों के योगदान को याद करने और उनके प्रति आभार व्यक्त करने का समय है। यह 15 दिनों की चांद्र अवधि है, जिसके दौरान परिवार अपने पूर्वजों को भोजन और विशेष अनुष्ठानों के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इन पवित्र कर्मों को श्राद्ध कहा जाता है।
इस दौरान ऐसी मान्यता है, कि हमारे पूर्वजों की आत्माएं धरती पर अपने वंशजों को आशीर्वाद देने के लिए आती हैं। यह सिर्फ एक धार्मिक समारोह नहीं है, बल्कि एक भावनात्मक रिश्ता है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखता है।
उत्तर और दक्षिण भारत में पंचांग का अंतर-
भारत की विविधता इसकी धार्मिक प्रथाओं में भी स्पष्ट दिखती है। दक्षिण भारतीय अमांत पंचांग के अनुसार, पितृ पक्ष भाद्रपद के चांद्र महीने में पूर्णिमा के दिन या उसके अगले दिन से शुरू होता है। वहीं उत्तर भारतीय पूर्णिमांत पंचांग में यह आश्विन महीने में मनाया जाता है, जो भाद्रपद की पूर्णिमा या उसके अगले दिन से आरंभ होता है।
हैरानी बात यह है, कि नामकरण में अंतर होने के बावजूद, दोनों परंपराओं में श्राद्ध की विधियां बिल्कुल समान तारीखों पर की जाती हैं। यह दर्शाता है, कि हमारी सांस्कृतिक प्रथाओं में कितनी एकता है, चाहे भौगोलिक भिन्नताएं कुछ भी हों।
पितृ पक्ष का अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या के नाम से जाना जाता है। यह सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है, जब वे लोग जो पहले के दिनों में श्राद्ध नहीं कर सके, सभी पूर्वजों को सामूहिक रूप से सम्मान दे सकते हैं।
पितृ पक्ष 2025 की संपूर्ण तारीख सूची-
इस वर्ष पितृ पक्ष 7 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर तक चलेगा। प्रत्येक दिन का अपना विशेष महत्व है और विभिन्न पूर्वजों के लिए अलग तारीखें निर्धारित हैं।
7 सितंबर रविवार को पूर्णिमा श्राद्ध से इसकी शुरुआत होगी। उसके बाद 8 सितंबर सोमवार को प्रतिपदा श्राद्ध, 9 सितंबर मंगलवार को द्वितीया श्राद्ध का दिन है। 10 सितंबर बुधवार को तृतीया और चतुर्थी श्राद्ध दोनों का संयुक्त आयोजन होगा।
11 सितंबर गुरुवार को पंचमी श्राद्ध और महा भरणी का विशेष दिन है। 12 सितंबर शुक्रवार को षष्ठी श्राद्ध, 13 सितंबर शनिवार को सप्तमी श्राद्ध होगा। 14 सितंबर रविवार को अष्टमी श्राद्ध और 15 सितंबर सोमवार को नवमी श्राद्ध का आयोजन है।
16 सितंबर मंगलवार को दशमी श्राद्ध, 17 सितंबर बुधवार को एकादशी श्राद्ध होगा। 18 सितंबर गुरुवार को द्वादशी श्राद्ध का दिन है। 19 सितंबर शुक्रवार को त्रयोदशी श्राद्ध और मघा श्राद्ध दोनों होंगे। 20 सितंबर शनिवार को चतुर्दशी श्राद्ध और अंत में 21 सितंबर रविवार को सर्व पितृ अमावस्या यानी महालया अमावस्या का सबसे महत्वपूर्ण दिन होगा।
पितृ पक्ष का आध्यात्मिक महत्व-
हिंदू मान्यता के अनुसार, श्राद्ध करने से मृत आत्माओं को शांति मिलती है और जीवित परिवारजनों में समृद्धि आती है। यह सिर्फ एक धार्मिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि एक भावनात्मक उपचार प्रक्रिया भी है, जो हमें अपने प्रिय लोगों के साथ संपर्क बनाए रखने में सहायता करती है।
इन अनुष्ठानों के दौरान आमतौर पर ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है, भोजन, जल और प्रार्थनाओं की भेंट दी जाती है। यह प्रथा सिखाती है, कि मृत्यु के बाद भी हमारे रिश्तों का महत्व बना रहता है। जब हम अपने पूर्वजों के लिए यह पवित्र कार्य करते हैं, तो यह हमें कृतज्ञता और विनम्रता की भावना देता है।
आधुनिक जीवन में पितृ पक्ष की प्रासंगिकता-
आज की व्यस्त जीवनशैली में भी पितृ पक्ष की परंपरा हमें महत्वपूर्ण मूल्य सिखाती है। यह समय हमें याद दिलाता है, कि हमारी उपलब्धियों में हमारे पूर्वजों का बड़ा योगदान है। उनके संघर्ष और बलिदान की वजह से ही आज हम यहां तक पहुंच पाए हैं।इस काल में परिवार एक साथ आते हैं, पुरानी यादें साझा करते हैं और अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हैं। यह एक सुंदर तरीका है, अपनी अगली पीढ़ी को पारिवारिक इतिहास और मूल्य स्थानांतरित करने का।
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श्राद्ध की सरल विधि-
श्राद्ध के लिए विस्तृत आयोजन की आवश्यकता नहीं है। सच्ची भावना से किया गया छोटा सा प्रयास भी बहुत अर्थपूर्ण होता है। घर में ही स्वच्छ स्थान पर पूर्वजों की तस्वीर रखकर, उन्हें उनका प्रिय भोजन अर्पित करके और उनके अच्छे कामों को याद करके भी यह पूजा संपन्न हो सकती है।
इस पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों को याद करिए, उनके प्रति आभार व्यक्त करिए और इस सुंदर परंपरा को आगे बढ़ाइए। यह न सिर्फ एक धार्मिक अभ्यास है, बल्कि एक माध्यम है अपने पारिवारिक बंधन को मजबूत बनाने का।
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