मंदिर होते हैं शक्तिक्षेत्र आगम और तंत्र परंपरा के अनुसार मंदिर ऐसे स्थान होते हैं जहां शुद्ध शक्ति (Shakti) का संकेंद्रण होता है। मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठा, मंत्र जाप और दैनिक पूजा से यहां ऊर्जा बहुत तीव्र हो जाती है।
नाड़ियों में असंतुलन की वजह जब कोई व्यक्ति मंदिर में प्रवेश करता है, तो उसका शरीर इस तीव्र आध्यात्मिक ऊर्जा के संपर्क में आता है। अगर शरीर की नाड़ियाँ (Energy Channels) कमजोर या ब्लॉक हों, तो शरीर इस ऊर्जा को तुरंत सहन नहीं कर पाता।
तंत्र शास्त्र क्या कहता है? तंत्र में माना जाता है, कि शक्ति पहले शुद्ध करती है, फिर संतुलन देती है। इस शुद्धिकरण के दौरान थकान, सिरदर्द, कमजोरी या हल्की बीमारी महसूस हो सकती है।
तीर्थ यात्रा और कर्मों का संबंध भक्ति और समर्पण के समय पुराने कर्म जागृत हो जाते हैं। ये सजा नहीं, बल्कि पुराने बोझ का निकलना होता है, जिसका असर शरीर पर अस्थायी कमजोरी या असहजता के रूप में दिख सकता है।
उपवास, पैदल यात्रा और जाप उपवास, लंबी पैदल यात्रा, मंत्र जाप और भावनात्मक जुड़ाव, शरीर पर आध्यात्मिक रूप से शुद्ध करने वाला लेकिन शारीरिक रूप से थकाने वाला असर डालते हैं।
डरने की नहीं, समझने की बात मंदिर से लौटकर बीमार पड़ना अशुभ नहीं, बल्कि यह संकेत हो सकता है कि शरीर और ऊर्जा एक नए संतुलन की ओर बढ़ रहे हैं।